उत्तराखंड से डॉल्फिन गायब हो गई हैं। कभी लोग हरिद्वार में डॉल्फिन देखने आयाकरते थे, लेकिन अब यहां गंगा में एक भी डॉल्फिन नहीं बची है। कुछ की निशानदेही बिजनौर के इलाके में हुई है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तराखंड में इनके खत्म होने का मुख्य कारण गंगा पर बने बांध, नदी में गिराया जा रहा औद्योगिक कचरा और कीटनाशक है। पहले ऋषिकेश से हरिद्वार के बीच डॉल्फिन के पांच सौ से अधिक वास स्थल थे। देश-विदेश के वैज्ञानिक हरिद्वार आकर डॉल्फिन पर शोध करते थे। पिछले दस वर्षों में हालात खराब हुए हैं।
केंद्र सरकार ने उत्तराखंड समेत गंगा बेसिन के सभी पांच राज्यों में डॉल्फिन की आबादी बढ़ाने के लिए भारतीय वन्य जीव संस्थान को जिम्मेदारी सौंपी है। फिलहाल इस राष्ट्रीय जलीय पशु के पुराने वास स्थलों की खोज हो रही है। इसके बाद इसके सुरक्षित वास स्थल का प्रबंध कराया जाएगा।
डॉल्फिन के संरक्षण पर काम कर रहे भारतीय वन्य जीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कमर कुरैशी ने बताया कि जगह-जगह बांध बनने से गंगा में पानी कम हुआ। कचरे के कारण पानी में आक्सीजन की मात्रा घटी है। डॉल्फिन की खासियत होती है कि अधिक सर्दी और गर्मी की स्थिति में यह गहराई में चली जाती है। चूंकि गंगा में कई स्थानों पर गहराई कम हो गई है।
इससे डॉल्फिन के लिए मुश्किलें बढ़ी हैं। पानी घटने से डॉल्फिन का वास स्थल असुरक्षित हो जाता है, जिससे इनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इन्हीं कारणों की वजह से डॉल्फिन ने देवभूमि के वासस्थलों से किनारा किया है।
‘डॉल्फिन के वास स्थलों को सुरक्षित करने के साथ गंगा के किनारे रहने वालों को भी जागरूक किया जाएगा। गंगा तट पर बचाव केंद्र भी खोले जाएंगे जिससे घायल डॉल्फिन का इलाज किया जा सके।’