उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) बीएस सिद्धू पर करीब चार साल तक नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में चले मामले में जस्टिस आरएस राठौर की पीठ ने फैसला सुरक्षित कर लिया है। पूर्व डीजीपी बीएस सिद्धू पर देहरादून के वीरगिरवाली गांव में वन्य आरक्षित क्षेत्र में प्लॉट खरीदने, लैंड यूज बदलने और अवैध तरीके से साल के पेड़ों की कटाई करने का आरोप है।
सिद्धू पर यह भी आरोप लगा कि डीजीपी अपने ही खिलाफ मामले की जांच कैसे कर सकते हैं? इस दौरान उन्होंने जमीन खरीदने और पेड़ काटने से संबंध नहीं होने के कई साक्ष्य पेश किए। एनजीटी बार एसोसिएशन का आरोप है कि पूर्व डीजीपी बीएस सिद्धू ने देहरादून में 20 नवंबर, 2012 को वन्य आरक्षित क्षेत्र में नत्थूराम नाम के काल्पनिक व्यक्ति से प्लॉट खरीदा और 13 मार्च, 2013 को उसका लैंड यूज बदल दिया। साथ ही वन्य क्षेत्र में मौजूद कीमती साल के पेड़ों को अवैध तरीके से कटवाया।
उत्तराखंड के मुख्य सचिव ने 2015 में एनजीटी को हलफनामा दाखिल कर बताया था कि 22 फरवरी, 1968 को ढाक पट्टी गांव में प्लाट नंबर 3/1 (15.23 एकड़) और 1 मई, 1970 को वीरगिरवाली गांव में प्लॉट नंबर 1/1 (3.86 एकड़) को वन्य आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था।
9 मार्च, 2013 को मसूरी वन विभाग को संबंधित क्षेत्र में साल के चार पेड़ और 18 मार्च, 2013 को 21 पेड़ों को अवैध तरीके से काटे जाने की सूचना मिली। 18 मार्च, 2013 को शुरू की गई जांच में पाया गया कि यह जमीन बीएस सिद्धू ने खरीदी है। आरोपों के बीच सिद्धू को डीजीपी बना दिया गया। 2016 में बीएस सिद्धू डीजीपी पद से सेवानिवृत्त हो गए।