हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने एकल पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें निकायों के परिसीमन की अधिसूचना को निरस्त कर दिया गया था।
अप्रैल में जारी निकायों के परिसीमन की अधिसूचना को निरस्त करने के एकल पीठ के फैसले के खिलाफ सरकार ने हाईकोर्ट में विशेष याचिका दायर की थी। खंडपीठ के फैसले के बाद नए परिसीमन की अधिसूचना प्रभावी हो गई है। इससे 41 निकायों में नए परिसीमन के आधार पर चुनाव कराने की राह भी खुल गई है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएम जोसफ और न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ के समक्ष मंगलवार को मामले की सुनवाई हुई। 14 मई को न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकल पीठ ने सरकार की ओर से पांच अप्रैल 2018 को जारी अधिसूचना को निरस्त किया था।
एकल पीठ के समक्ष कोटद्वार मवाकोट की 35 ग्राम सभाओं सहित भवाली, डोईवाला, तिलवाड़ा, हल्द्वानी, काशीपुर, टनकपुर, पिथौरागढ़ और दो दर्जन से अधिक निकायों के सीमा विस्तार को लेकर याचिकाएं दायर की गईं थी। याचिका में कहा गया था कि संविधान में स्पष्ट प्रावधान है कि राज्यपाल ही किसी भी क्षेत्र को नगरपालिका में शामिल करने के लिए अधिकृत हैं। एकल पीठ ने संविधान के इसी प्रावधान को आधार बनाकर फैसला दिया था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बना आधार
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पांच अप्रैल की अधिसूचना को राज्यपाल की ओर से नहीं बल्कि सरकार की ओर से जारी किये जाने के आधार पर खारिज किया था। सरकार ने खंडपीठ के समक्ष तर्क दिया गया कि 1974 के शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य सरकार के मामले में सात जजों की बेंच ने निर्णय दिया था कि किसी राज्य के राज्यपाल या राज्य सरकार का फैसला एक ही होता है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 166 के तहत व्यवस्था है कि सरकार का कोई भी कार्य राज्यपाल के नाम पर ही किया गया माना जाएगा।