पिछले दो साल के दौरान एक दर्जन से ज्यादा नए निकायों के गठन पर सवाल उठ रहे हैं। चुनाव से पहले सरकार चार और निकायों को नगर निगम का दर्जा देने की तैयारी में है। मगर निकायों का असल सच यह है कि इनमें से ज्यादातर निकाय गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं।
तकरीबन सभी निकायों में स्वीकृत ढांचे के सापेक्ष स्टॉफ नहीं हैं। जिन निकायों में जो कर्मचारी हैं, वे महीनों से पगार का इंतजार कर रहे हैं। केंद्रीय और राज्य वित्त आयोग की अनुशंसा पर जो राशि निकायों को मिलती है, वो विकास कार्यों के बजाय कर्मचारियों के वेतन में खप जाती है।
पिछले दो वर्ष में सरकार एक दर्जन से अधिक शहरी निकायों का गठन कर चुकी है। आधा दर्जन निकाय उच्चीकृत हुईं। चुनावी साल में सरकार ने चार नगर पालिकाओं क्रमश: मसूरी, नैनीताल, ऋषिकेश और श्रीनगर को नगर निगम का दर्जा देने की तैयारी कर ली।
वर्तमान में छह नगर निगम, 38 नगर पालिकाएं और 45 नगर पंचायतें अस्तित्व में आ चुकी हैं। मजेदार बात यह है कि इनमें ज्यादातर निकायों की हालत बेहद खस्ता है। मसूरी, नैनीताल नगर पालिका और देहरादून, हरिद्वार, रुद्रपुर और काशीपुर नगर निगमों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो ज्यादातर निकायों की माली हालत बेहद खराब है।
कई निकायों में कर्मचारियों को महीनों से पगार नहीं मिली है। कई निकायों में दक्ष स्टॉफ का अभाव है। वे केंद्रीय वित्त आयोग और राज्य वित्त आयोग की संस्तुतियों पर मिलने वाली राशि पर निर्भर है।