सुबह का वक्त है। नारी निकेतन का गेट खुलता है और एक युवक अंदर दाखिल होता है। एक संवासिनी बाहर निकलती है।
आगंतुक और संवासिनी की निगाह जैसे मिली लगा कुछ क्षण के लिए दोनों सकते में आ गए। फिर भावनाओं का तूफान उठा और दोनों एक-दूसरे के चेहरे पर निगाह जमाए चीख मारकर रो पड़े। आंसुओं के सैलाब से चेहरा तर हो गया।
चंद लम्हों के बाद दोनों रोते-रोते फिर हंस पड़े। चेहरे पर गम और खुशी के आंसू एक-दूसरे में घुलते-मिलते रहे। भावनाओं के तूफान में ठहराव आने के बाद भूली-बिसरी यादों की चर्चा होने लगी। बात हो रही है सात सालों से नारी निकेतन में रह रही नेपाल की संवासिनी की।
रविवार को उसका भाई उसे लेने आया है। जब बहन और भाई मिले तो खुशी में वे रोने वाले अकेले नहीं थे। भाई-बहन का मिलन देखकर पूरा नारी निकेतन रो रहा था। इनमें संवासिनियें भी थीं और अधिकारी कर्मचारी भी। भाई-बहन के पहचान लेने के बाद कागजी खानापूरी के लिए उसका भाई हरिद्वार चला गया था।
संवासिनी यहां सिटी मजिस्ट्रेट हरिद्वार के आदेश पर आई थी। अपर सचिव समाज कल्याण मनोज चंद्रन ने बताया कि कोर्ट ने संवासिनी रिलीज करने के आदेश कर दिए हैं। सोमवार को संवासिनी अपने भाई के साथ चली जाएगी।