फेसबुक के सीईओ जुकरबर्ग अमेरिका ही अकेली हस्ती नहीं हैं जिन्हें कैंची धाम के संत नीम करौली बाबा से प्रेरणा मिली हो, उनसे पहले अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रह चुके जाने-माने मनोचिकित्सक प्रो. एलपर्ट रामदास 1967 में भारत आए और नीम करौली बाबा के शिष्य बन गए।
नीम करौली बाबा से मिलने के बाद उनकी जिंदगी ही बदल गई और बाबा जी ने उन्हें रामदास नाम दिया। इस अंग्रेज विद्वान ने हिंदू धर्म अपनाया और अमेरिका में अनेक संस्थाओं के जरिए लोगों की सेवा में लग गए। उन्होंने 15 किताबें लिखी हैं इनमें कई पुस्तकें काफी चर्चित रही हैं। इसमें एक किताब नीम करौली बाबा के बारे में भी है। उन्होंने न्यूयार्क में नीम करौली बाबा का मंदिर भी बनवाया है।
डॉ. रिचर्ड एलपर्ट का जन्म 1931 में हुआ। अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद वह कैलिफोर्निया और वर्कले विवि में विजिटिंग प्रोफेसर रहे। फिर हार्वर्ड विवि में स्थायी रूप से मनोविज्ञान के प्रोफेसर बन गए। 1963 में उन्होंने हार्वर्ड विवि से इस्तीफा दे दिया।
अपनी मां के निधन के बाद वह काफी दुखी और बेचैन हो गए थे और शांति पाने के उद्देश्य से 1967 में वह भारत आए। अपने एक मित्र की सलाह पर वह नीम करौली बाबा से मिले। एलपर्ट ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि नीम करौली बाबा ने मां के निधन की सारी कहानी उन्हें बता दी।
इस पर प्रो. एलपर्ट बाबा जी के गले लगकर खूब रोये और उन्हें ऐसा लगा मानो वह अपने घर पहुंच गए हों। प्रो. एलपर्ट ने बाबा जी को अपना गुरु बना लिया। नीम करौली बाबा ने प्रो. एलपर्ट को राम दास नाम दिया और दीक्षा भी दी। उन्होंने हिंदू धर्म अपनाने के साथ ही हिंदू धर्म के बारे में काफी अध्ययन किया।
नीम करौली बाबा पर लिख दी किताब
साथ ही ध्यान, योग आदि भी सीखा। करीब डेढ़ साल बाद वह अमेरिका लौटे और वहां जाकर उन्होंने छह माह तक मौन धारण कर लिया और ध्यान करने लगे। रामदास ने अमेरिका में हनुमान फाउंडेशन, सेवा फाउंडेशन, नीम करौली बाबा की स्मृति में लव सर्व रिमेंबर फाउंडेशन स्थापित करके लोगों के स्वास्थ्य लाभ और अन्य तरह के सेवा कार्य किए।
साथ ही योग और ध्यान के प्रचार-प्रसार के लिए शिविर आदि भी आयोजित करते रहे। एलपर्ट रामदास ने 15 किताबें लिखी हैं। इनमें कई पुस्तकें काफी चर्चित रही हैं। एक पुस्तक नीम करौली बाबा पर मिरेकल ऑफ लव और भगवत गीता पर पाथ ऑफ गॉड भी शामिल है। उन्हें अमेरिका में कई पुरस्कार भी मिले हैं।
1996 में अमेरिका में शुरू किया गया उनका रेडियो टॉक कार्यक्रम हेयर एंड नाउ विद रामदास काफी चर्चित हुआ। 1997 में उन्हें लकवा पड़ गया जिससे उनका भ्रमण करना काफी कम हो गया, लेकिन आज भी वह अपनी वेब साइट आदि के जरिये हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए काम कर रहे हैं।
एलपर्ट तारों के बीच खोजते थे अपनी मां को
प्रो. एलपर्ट अपनी मां को बहुत प्यार करते थे। 1967 में जब प्रो. एलपर्ट पहली बार नीम करौली बाबा से मिले तो वह अपनी मां की मृत्यु से बहुत दुखी थे। रात में वह तारों की तरफ देखकर सोचते थे कि इन्हीं में से एक तारा उनकी मां भी है। नीम करौली बाबा ने प्रो. एलपर्ट से पहली मुलाकात में ही यह बात बता दी कि आपके दिल में अपनी मां के लिए क्या बात चल रही है, जिससे वह आश्चर्यचकित रह गए।