1991 के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान 21 मई 91 को श्रीपेराम्बुदूर में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बम विस्फोट में हत्या हो जाने के बाद पूरे देश में कांग्रेस के प्रति भारी सहानुभूति उमड़ पड़ी थी और कांग्रेस भारी बहुमत से चुनाव जीती भी।
यह संयोग ही रहा कि तत्कालीन नैनीताल बहेड़ी लोकसभा सीट पर नैनीताल जिले की सभी विधानसभा सीटों पर आगे रहने के बावजूद अपने ही गढ़ रहे बहेड़ी से तिवारी पिछड़ गए और 800 वोट से बलराज पासी से चुनाव हार गए थे।
राजीव गांधी की हत्या और गांधी परिवार से कोई दावेदार न होने के कारण इस बार कांग्रेस से लाल बहादुर शास्त्री के बाद एक बार फिर किसी गैर गांधी का पीएम बनना तय था और इसके लिए तिवारी का नाम उनकी योग्यता, व्यवहार और सर्व स्वीकार्यता के चलते सुनिश्चित माना जा रहा था। लेकिन उनके चुनाव हार जाने के कारण वह इस दौड़ में शामिल तक न हो पाए और पीवी नारसिम्हा राव अप्रत्याशित रूप से पीएम बन गए।
राज्य गठन के 18 सालों में उत्तराखंड के विकास की जो तस्वीर दिखाई दे रही है, उसमें रंग बेशक बाद में आई सरकारों ने भरे हों। मगर खाका एनडी तिवारी के कार्यकाल में ही खींचा गया।
विशेष औद्योगिक पैकेज का एनडी तिवारी ने अपने राजनीतिक अनुभव और प्रभाव के दम भरपूर लाभ उठाया और उत्तराखंड को औद्योगिक राज्य की श्रेणी में ला खड़ा किया।
उन पर राज्य की बेशकीमती कृषि भूमि को तबाह करने के भी आरोप लगे। मगर आलोचनाओं और विरोधों से बेफिक्र एनडी ने देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में औद्योगिक अवस्थापना की शुरुआत की।
उनकी दृष्टि में दून घाटी में हैदराबाद की तर्ज पर सिलिकॉन सिटी बनने की अपार संभावनाएं थीं। माइक्रो सोफ्ट कंपनी के संस्थापक बिल गेट्स जब भारत आए तो एनडी ने उनसे दून को आईटी हब में बदलने की पेशकश की थी।
सहस्त्रधारा में आईटी पार्क दरअसल एनडी की उसी सोच की देन है। देश-दुनिया का चप्पा-चप्पा छान चुके एनडी जानते थे कि आने वाला दौर आईटी का है।
एनडी के कार्यकाल में ही तकनीकी विवि, उत्तराखंड संस्कृत विवि और दून विवि की नींव रखी गई। एनडी ने हर्बल, पावर और उद्यान के क्षेत्र में भी तरक्की की संभावनाएं टटोली। उनके दौर में करीब 3700 मेगावाट की बिजली परियोजनाओं पर प्रदेश सरकार ने फोकस किया। भौगोलिक चुनौतियों को देखते हुए ही उन्होंने आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण की स्थापना की।