बहादुरी के लिए उत्तराखंड के 11 बच्चों को अब तक पुरस्कृत किया जा चुका है। इनमें तीन बच्चों को मरणोपरांत यह पुरस्कार मिला। 2003 में टिहरी गढ़वाल के हरीश राणा, 2004 में हरिद्वार की माजदा, 2006 में अल्मोड़ा की पूजा कबडवाल, 2010 में देहरादून के प्रियांशु जोशी, इसी वर्ष श्रुती लोधी को मरणोपरांत, 2011 में रुद्रप्रयाग के कपिल नेगी को मरणोपरांत, 2014 में चमोली की मोनिका को मरणोपरांत, 2014 में देहरादून के लाभांशु, 2015 में टिहरी गढ़वाल के अर्जुन सिंह, 2016 में देहरादून के सुमित ममगाई और 2017 में टिहरी गढ़वाल के पंकज सेमवाल को यह पुरस्कार मिल चुका है।
छह से 18 वर्ष के बच्चों को दिया जाता है पुरस्कार
राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए बच्चों की उम्र छह से 18 वर्ष होनी चाहिए। इस बार एक जुलाई 2018 से 30 जून 2019 के बीच बहादुरी का परिचय देने वाले बच्चों को सम्मानित किया जाएगा। जिस बच्चे ने अपने प्राणों को संकट में डालकर दूसरों की रक्षा की हो या किसी दुर्घटना और अपराध को रोकने जैसा साहसी कार्य किया हो, नामांकन करा सकता है।
यदि आप भी ऐसे किसी बच्चे को जानते हैं जो राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए पात्र हो सकता है तो उससे संबंधित प्रकरण की पूरी जानकारी के साथ अपने जिले के जिलाधिकारी, एसएसपी या मुख्य शिक्षा अधिकारी से तत्काल संपर्क करें। उनके माध्यम से यह जानकारी उत्तराखंड राज्य बाल कल्याण परिषद तक पहुंच जाएगी। परिषद के स्तर पर जानकारी की सत्यता परखने के बाद पात्र बच्चों की जानकारी भारतीय कल्याण परिषद नई दिल्ली भेज दी जाएगी।
इस वर्ष अब तक एक भी बच्चे का नाम परिषद के पास नहीं आया। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रदेश में एक भी बहादुर बच्चा नहीं है। असल में कई बार अधिकारी बच्चों का नाम भेजने में रुचि नहीं लेते, यदि अब भी किसी बच्चे का नाम आने से छूट गया है तो हम भारतीय बाल कल्याण परिषद से अनुरोध कर उसका नाम भेज सकते हैं।
-पुष्पा मानस, महासचिव उत्तराखंड राज्य बाल कल्याण परिषद
राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार को लेकर लोगों में जागरूकता की कमी है, लोगों को इस बारे में जागरूक करना होगा, वहीं यह भी जरूरी है कि जनपदीय अधिकारी इस तरह के प्रकरणों को गंभीरता से लें।
-केपी भट्ट संयुक्त सचिव, उत्तराखंड राज्य बाल कल्याण परिषद