यात्रा के चौथे पड़ाव सेम के बाद से ही लोक की नंदा अब ऊंचे पहाड़ों की ओर बढ़ चली है। दूर-दराज और एक-दूसरे से छिटके गांवों की छंतोलियां नंदा की इस यात्रा में शामिल हो रही हैं। इसी के साथ यात्रा का स्वरूप और बड़ा होता जा रहा है।
नौटी से लेकर कोटी तक का 50 किमी का सफर तय कर रही नंदा अब तक इन बीच के गांवों की दुर्दशा, बदहाली और अपनी जड़ से टूटने की त्रासदी भी उकेर रही है। बिखर रहे इन गांवों को नंदा वापस बुला रही है। नौटी से लेकर कोटी तक के कई दर्जन गांवों से होकर यात्रा गुजरी है। हर गांव की लगभग-लगभग एक जैसी तस्वीर है।
गांव खाली हो रहे हैं। पहाड़ शहर की ओर जा रहा है। निचले इलाके के गांव कहीं पानी, कहीं सड़क तो कहीं जंगली जानवरों से परेशान होकर खाली हो रहे हैं। अध्यात्म और धार्मिक रीति-रिवाजों की डोर में बंधे गांव अपने जीने का सहारा खोजते हुए दिखते हैं।
सुकून इस बात है कि खेत बंजर नहीं दिखते। खेतों में कौंणी, मंड़वा, धान, झंगोरा और चौलाई की फसल लहलहाती दिख रही है पर अधिकतर गांवों में आधे से ज्यादा घरों में ताले लटके मिलते हैं।