उत्तराखंड में आयोजित होने वाली एशिया की सबसे लंबी पैदल यात्रा राजजात हिमालय क्षेत्र की अराध्य देवी मां नंदा को उनके ससुराल भेजने की यात्रा है।
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पट्टी चांदपुर और श्रीगुरू क्षेत्र को मां नंदा का मायका और बधाण क्षेत्र (नंदाक क्षेत्र) को उसकी सुसराल माना जाता है।
यह यात्रा पहाड़ के परिवेश में प्राचीन काल में विवाहिता बेटी की दुर्गम ससुराल क्षेत्र की परिस्थितियों और ससुराल के प्रति उसका स्नेह और अपनत्व को भी बखूबी बयां करती है।
मां नंदा को भगवान शिव की पत्नी माना जाता है और कैलाश शिव का घर है, जहां नंदा की ससुराल है। किवदंती यह भी है कि एक बार नंदा अपने मायके आई हुई थी। लेकिन वह किन्हीं कारणों से 12 वर्ष तक ससुराल नहीं जा सकी। बाद में उसे आदर-सत्कार के साथ उसकी ससुराल भेजा गया।
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इसी परंपरा के निर्वहन को श्रीनंदा राजजात कहा जाता है। गढ़वाल राजा शालीपाल को इस यात्रा को शुरू करने और कनकपाल को इसे और भव्य रूप देने का श्रेय भी है।
जमन सिंह जदोड़ा (गुसाई) का भी उल्लेख
जमन सिंह जदोड़ा की मां नंदा राजराजेश्वरी, जै बोला, जै भगोती नंदा, नंदा ऊंचा हिमालय की, जमन सिंह जदोड़ा की मां नंदा राजराजेश्वरी... जै बोला, मां श्रीनंदा की जागर में देवी के गुणणान के साथ उसके परम भक्तों का भी उल्लेख मिलता है।
देवी के इन्हीं भक्तों में संगमस्थली के ईड़ा-बधाणी गांव के जमन सिंह जदोड़ा (गुसाई) का भी उल्लेख मिलता है।
राजजात में ससुराल (कैलाश) के लिए विदा होने से पूर्व मां श्रीनंदा रात्रि विश्राम के लिए जदोड़ा गुंसाई (थोकदार) लोगों के यहां पहुंचती है।
मान्यता है कि मां और भक्त के वचन के निर्वहन के लिए राजजात में कैलाश विदा से पूर्व पहले पड़ाव पर मां नंदा ईड़ा-बधाणी पहुंचती है।
अपने भक्त को दिए वचन का पालन करने राजजात में मां श्रीनंदा की छंतोली नौटी से पहले दिन रात्रि विश्राम के लिए ईड़ा-बधाणी गांव में जदोड़ा गुंसाई लोगों के घर पहुंचती है। यहां अपनी अराध्य को जदोड़ा वंशज जेवर, कलेउ एवं श्रृंगार सामग्री भेंट करते हैं।
यह है मान्यता
मान्यताओं के अनुसार प्राचीनकाल में भगवान आशुतोष एवं मां पार्वती इस स्थान से कैलाश जा रहे थे।
इसी दौरान मां पार्वती को प्यास लगी और वे समीपवर्ती गांव बधाणी जा पहुंची। जबकि भगवान शंकर सीधे शैलेश्वर की ओर निकल गए।
बधाणी गांव में उस समय के थोकदार एवं पधान जमन सिंह जदोड़ा (गुसाई) ने उन्हें पानी पिलाने के साथ खूब आदर सत्कार करते हुए दही-भात भी खिलाया।
विदा होते समय जमन सिंह जदोड़ा ने देवी मां से कहा कि कैलाश जाते समय वे जरुर उसके घर पर आए।
इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए मां श्रीनंदा राजजात में कैलाश विदा होने से पूर्व ईड़ा-बधाणी में जदोड़ा वंशज गुंसाई लोगों के घर रात्रि विश्राम करती है। इस विषय में कई किवदंतियां भी प्रचलित हैं।
राजजात में मां श्रीनंदा को अनेक रुपों में पूजा जाता है। ध्याण से लेकर बहु के रुप में अराध्य मां श्रीनंदा को मायके पक्ष से अन्न, धन एवं श्रृंगार सामग्री भेंट की जाती है।
जबकि ससुराल पक्ष में मायके से दी गई इस सामग्री को देवी भक्त प्रसाद के रुप में आपस में बांटते हैं। कुरुड, नौटी, बधाण से होते हुए पिंडरघाटी में मां श्रीनंदा को अराध्य देवी के रुप में पूजा जाता है।
घाट ब्लाक के कुरुड, नौटी से लेकर नारायणबगड़ के भगोती गांव तक की मां श्रीनंदा का मायका क्षेत्र माना जाता है। यहां मां को बेटी, बहिन (ध्याण) के रुप में पूजा जाता है। भगोती के बाद नंदा का ससुराल शुरू हो जाता है
देवराड़ा मां नंदा का ननीहाल थराली विकासखंड का देवराड़ा गांव मां श्रीनंदा का ननीहाल माना जाता है। प्रतिवर्ष घाट कुरुड से वैदनी तक आयोजित होने वाली लोकजात में भादो की सप्तमी के बाद मां श्रीनंदा यहां छ: माह प्रवास करती है।