चेचक को खत्म करने के उद्देश्य से वैक्सीन का निर्माण भी भारत में पटवाडांगर के इस संस्थान से ही हुआ था। वर्ष 1957 में इस संस्थान में एंटी रैबीज वैक्सीन और बाद में टिटनस के वैक्सीन का उत्पादन भी शुरू किया गया। वर्ष 1980 में विश्व से चेचक का उन्मूलन होने के बाद वर्ष 2003 तक अन्य वैक्सीन यहां उत्पादित होते रहे। तत्कालीन तकनीक एवं डब्ल्यूएचओ निर्धारित मानकों के अनुरूप अपेक्षित सुधार और बदलाव करने के बजाय यहां सभी तरह की वैक्सीन का उत्पादन ही बंद कर दिया गया।
2005 में जीबी पंत कृषि विवि को हुआ था हस्तांतरित
वर्ष 2005 में उत्तराखंड सरकार ने इस संस्थान को जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर को हस्तांतरित कर दिया। 15 साल तक यह संस्थान पंतनगर विवि के पास रहा लेकिन कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल न हो सकी। 2019 में कुमाऊं विवि के तत्कालीन कुलपति प्रो. केएस राणा ने इस जगह को विवि को दिए जाने की मांग जोर शोर से उठाई लेकिन 2020 में उत्तराखंड शासन ने इसे उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद हल्दी को सौंप दिया।
स्टेट वैक्सीन इंस्टिट्यूट पटवाडांगर 2003 में जब से बंद हुआ तब से आज तक किसी ने इसकी सुध नहीं ली। इस बेहतरीन और बेशकीमती परिसर की दुर्दशा हो चुकी है। कभी एक और कभी दूसरे संस्थान को सौंपे जाने से इसकी स्थिति फुटबॉल जैसी हो गई है। सारे भवन जर्जर हैं और इसका कोई भी उपयोग नहीं हो रहा है।
-हिमांशु पांडे, ज्येष्ठ ब्लॉक प्रमुख, भीमताल
पटवाडांगर स्थित पूर्व स्टेट वैक्सीन इंस्टीट्यूट की भूमि का यदि जीबी पंत विश्वविद्यालय अथवा जैव प्रौद्योगिकी परिषद के ओर से उपयोग नहीं किया जा सका हो तो राज्य सरकार को इसे वापस लेकर इसमें आधुनिक तकनीक से वैक्सीन बनाने की शुरुआत करनी चाहिए। वर्तमान में उतराखंड रैबीज के टीके हिमाचल प्रदेश से मंगा रहा है, जबकि पूर्व में इसका उत्पादन पटवाडांगर में ही होता था। ऐसे बेशकीमती परिसर का निष्प्रयोज्य पड़ा होना दु:खद है। इसका सदुपयोग होना चाहिए।
- अजय भट्ट, सांसद नैनीताल-ऊधमसिंह नगर संसदीय क्षेत्र