नैनीताल हाईकोर्ट ने हटा दिया राष्ट्रपति शासन
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नैनीताल हाईकोर्ट के सरकार को निकायों में नए सिरे से आरक्षण की स्थिति तय करने के आदेश से इस बात की तस्दीक हो रही है कि प्रदेश सरकार ने निकाय चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया।
पहले राज्य निर्वाचन आयोग का ही सरकार के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना सरकार की चुनाव समय से कराने की मंशा पर सवाल उठा गया था। फिर बगैर राज्यपाल के हस्ताक्षर की अधिसूचना जारी करने को लेकर और उसके बाद रुड़की नगर निगम को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखकर सरकार ने एक मोरचा और खोल लिया।
अब 41 में से दो पालिकाओं को आरक्षण निर्धारण में छोड़ने के कारण का सरकार के पास जवाब तक नहीं है और वह कोर्ट में कुछ बता पाने की स्थिति में भी नहीं रही। कोर्ट ने जब इसका कारण पूछा तो सरकार की ओर से इस चूक का कोई भी कारण नहीं बताया जा सका। किच्छा के मुश्ताक अहमद की याचिका पर दोपहर दो बजे सुनवाई हुई और कोर्ट ने सरकार से जवाब देने को कहा।
साढ़े तीन बजे दोबारा सुनवाई हुई पर सरकार इस पर कोई तथ्य या सफाई तो दूर जवाब तक नहीं दे सकी। कोर्ट ने माना कि इस मामले में गंभीर चूक हुई है और बगैर वजह दो पालिकाओं को आरक्षण तय करने की प्रक्रिया में शामिल किए बिना ही पूरे प्रदेश की 41 पालिकाओं का आरक्षण तय कर दिया।
बाजपुर में अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या किच्छा से ज्यादा है। बावजूद सरकार ने किच्छा में तो आरक्षण किया पर बाजपुर को रोस्टर से बाहर रखा। जाहिर है कि बाजपुर के साथ श्रीनगर को रोस्टर प्रक्रिया में शामिल किया जाता तो न केवल इन दो की, बल्कि प्रदेश की समस्त पालिकाओं में आरक्षण की तस्वीर कुछ और होती।