अपने मौसम और हरियाली के अलावा देहरादून और मसूरी की एक और विशेष पहचान हैं। वो है मशहूर अंग्रेजी लेखक रस्किन बांड। दूसरे शब्दों में कहें तो रस्किन बांड का साहित्य भी बहुत हद तक दोनों पहाड़ी शहरों के विश्व प्रसिद्ध ख्याति का परिचायक है। रस्किन बांड के 87वें जन्मदिन पर उनके जीवन से जुड़ी कुछ बातों के बारे में देहरादून की प्रसिद्ध लेखिका और समाजसेवी प्रतिभा नैथानी ने अपने विचार रखे हैं।
उनका कहना है कि 1934 में कसौली में जन्म और देहरादून में सत्रह वर्षीय नवयुवक होने तक का समय गुजारने के बाद दूसरे कई अंग्रेजों की तरह ही रस्किन भी रोजी-रोटी की तलाश में लंदन चले गए थे । यह 1951 के आसपास की बात है जब भारत आजाद हो चुका था। लेकिन खूब घने पेड़ों के बीच बसे उनकी दादी के घर में बिताए हुए बचपन के दिन और हिंदुस्तानी साथियों की याद ब्रिटेन में हमेशा के लिए बस जाने से उनका मोहभंग करती रहती। यही यादें सहारा बनीं "द रुम ऑन द रूफ" उपन्यास लिखने में। उपन्यास काफी प्रसिद्ध हुआ और इससे उनकी जो कमाई हुई, उन पैसों से उन्होंने 'स्वदेश' यानी भारत वापसी की। उपन्यास की कथावस्तु का केंद्र देहरादून शहर था जिस पर उन्हें अपने समय का एक प्रसिद्ध पुरस्कार भी प्राप्त हुआ । उसके बाद जीवन यापन के लिए उन्होंने लेखन को ही सहारा बना लिया। रस्किन बॉन्ड की लेखन शैली बेहद सहज और सरल रही इसलिए जल्द ही वह बेस्टसेलर लेखकों में शामिल हो गए।
तब उन्होंने 'द थीफ', 'व्हेन डार्कनेस फॉल्स, 'अ फेस आन द डार्क', द काइट मेकर, द टनल , अ फ्लाइट्स ऑफ पिजन, द वुमन आन प्लेटफार्म, मोस्ट ब्यूटीफुल, डेल्ही इज नॉट फार, एंग्री रिवर .... जैसी पांच सौ से भी अधिक कहानियां, उपन्यासों, लेख और कुछ कविताओं की रचना की। कथावस्तु बहुत सामान्य और सरल होने के बावजूद भी उनकी हर रचना दिल पर एक खास प्रभाव छोड़ जाने में कामयाब रहती है।
कुछ भुतहा कहानियां भी उन्होंने लिखी। लेकिन उनमें भी ऐसा असामान्य कहीं नहीं कि पाठक डर के मारे आधे में ही किताब छोड़ देने को मजबूर हो जाएं। 'टोपाज' की नायिका हमीदा के प्रेतात्मा होने का रोमांच और सुरमई शाम के अंधेरे में एक दूसरे में खोए लेखक और उसके बीच- "यह समय नहीं है जो बीत रहा है। यह हम और तुम हैं जैसे संवाद की कसक टोपाज को हमीदा जैसी ही बेहद खूबसूरत और यादगार कहानी बना जाती है। इसी तरह "सुजैन' स सेवन हस्बैंड" भी है, जिस पर सात खून माफ नाम से हिंदी फिल्म भी बनी है। हां, "अ फेस इन द डार्क" जरूर सिहरन पैदा करने में कामयाब हो जाती है।
अपने पिता की मृत्यु के बाद अकेले रह गए रस्किन को और अधिक उदास किया उनकी मां की दूसरी शादी और देहरादून में उनके गार्जियन बने मिस्टर हैरिसन के परिवार ने। भारतीयता के रंग में रंगे रस्टी को पक्का अंग्रेज बनाने में वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। इसलिए वह अक्सर रस्टी की पिटाई भी कर देते थे। तब एक दिन विरोध में अपने संरक्षक पर हाथ उठा रस्टी घर से भाग गया। यह सब कुछ बहुत दुखद था। लेकिन इन सब विपरीत परिस्थितियों ने उनके हृदयस्पर्शी लेखन के लिए अच्छी जमीन तैयार कर ली। "रुम ऑन द रूफ" इन्हीं घटनाओं की परिणति है।
"एक नन्हा दोस्त" कहानी के शीर्षक से लगता है कि ये जरूर किसी छोटे बच्चे से उनकी दोस्ती की कहानी होगी। लेकिन नहीं यह तो एक नन्हा चूहा है जो अकेले कमरे में काम से लौटे थके हारे रस्किन का इंतजार करने वाला साथी है। मकान मालकिन के नाराज होने के बावजूद भी रस्किन उसके लिए फर्श पर ब्रेड और चीज का चूरा बिखरा कर रखते हैं। सुखद लगता है रस्किन का उसके भाग्य पर ईर्ष्यालु हो जाना जब कमरा खाली कर जाने से पहले चूहे को एक चुहिया का साथ मिल जाता है।
अकेलेपन से घबराकर खुद को तबाह कर देने वालों के किस्सों से दुनिया भरी पड़ी है, रस्किन जैसे विरले ही उदाहरण कहीं मिलते हैं जिन्होंने इसे गले लगा कर खुद को कामयाबी की मिसाल बना दिया। ऐसा नहीं है कि रस्किन की जिंदगी में अच्छे पलों की कमी रही हो। देहरादून में हर साल अपनी दादी के घर में बिताई गई गर्मी की छुट्टियों के दिन भी रस्किन की कई कहानियों में हमें तरोताजा करते हैं। रस्किन लिखते हैं कि उनकी दादी बहुत अच्छी कुक थीं। वो रस्किन का बहुत ख्याल रखती थीं। कभी-कभी उनसे मिलने दादी के भतीजे केन अंकल भी आया करते थे। केन निठल्ले किस्म के आदमी थे। उनके साथ रस्टी की नोंक-झोंक और केन अंकल के अजीब कारनामों से भरी "क्रेजी टाइम्स विद अंकल केन" में लिखी हुई कहानियां आज भी बच्चों को बहुत पसंद आती हैं।