गांव में बचे बूढ़ों ने उसे संवारने का प्रयास किया, लेकिन बंदरों, लंगूरों सूअरों ने फसलें तबाह करनी शुरू कर दी। हर बार जंगली जानवरों से अपनी फसल लुटती देख उन्होंने भी खेती करनी बंद कर दी। इसके बाद बंजर खेतों में झाड़ियां उग आईं।
जगंली जानवरों को इन झाड़ियों में छुपने की जगह मिल गई। दिन में बन्दर, लंगूर और रात को सूअर फसलें तबाह करने लगे। इस समस्या के समाधान को प्रदेश में चकबंदी कानून तो बना, लेकिन वह लागू नहीं हो पाया। जंगलों का फैलाव होता चला गया, जो लोगों के चैक-चैबारों तक पहुंच गया। अब गुलदारों ने इन्हीं जंगलों और खंडहरों में तब्दील हुए घरों
को अपना ठिकाना बना लिया है।
ये ऐसे कुछ कारण थे, जिनके कारण पौड़ी जिले के कल्जीखाल ब्लाक के चैंडलि गांव में रहने वाले आखिरी बुजुर्ग दम्पत्ति को भी अपना घर गांव छोड़ना पड़ा। इसी तरह अभी कुछ ही दिन पहले इसी ब्लाक के बलुणि गांव के स्यामा प्रसाद दंपत्ति ने भी गांव छोड़ दिया। ये एक उदाहरण भर हैं। तस्वीरें बताती हैं की कैसे गांव के गांव में अब केवल बुजुर्ग रह गए हैं, जो शाम ढलते ही घरों में कैद होने हो मजबूर हो जाते हैं।
कुल मिलकर, पर्वतीय प्रदेश की आत्मा पहाड़ों के गांव भगवान भरोसे हैं। उत्तरकाशी के सर बड़ियार घाटी के 8 गांव के लगभग 5000 से ज्यादा लोग सड़क, बिजली, पुल आदि के लिए तरस रहे हैं। बारिशो में ये लोग देश दुनिया से कट जाते हैं। सरकार तीन महीने का राशन उपलब्ध कराकर अपना पिड़ छुड़ा देती है।
पर्यटन रोजगार का जरिया बन सकता था, लेकिन सरकारों ने केवल हसीन सपने दिखाए। पहाड़ों का खाली होना देश की सुरक्षा दृष्टि से भी खतनाक है। प्रदेश का अस्तित्व बिना गांवों के नहीं हैं। सरकारों को समझना होगा कि कहीं राज्य तीन मैदानी जिलों तक न सिमट जाएं और पहाड़ वियावान हो जाएं।