महिला सशक्तिकरण और बाल विकास मंत्री रेखा आर्या जब भी मुश्किल घड़ी में होती है, तो वह अपनी मां पुष्पा देवी की तरफ देखती हैं।
भले ही उनकी मां बेहद बीमार हैं, लेकिन रेखा आर्या जब उनके पास होती हैं, तो मजबूती महसूस करती हैं। बकौल, रेखा आर्या-मां से उन्होंने जीवटता सीखी है। कैसे विपरीत स्थितियों में धैर्य नहीं खोना है। कैसे स्थितियों का सामना करना है। ये सब मां ने ही सिखाया है। एक और बात का रेखा आर्या जिक्र करती हैं। वह है हर हाल में रचनात्मक रहना।
रेखा आर्या का बचपन कुमाऊं से लेकर मध्य प्रदेश तक में बीता है। गांव से लेकर शहर के अनुभव मां के साथ हासिल किए हैं।
ईंट-पत्थर सिर पर ढोकर लाने में मां को कोई हिचक नहीं होती थी
रेखा आर्य
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रेखा आर्या बताती हैं-मैंने अपनी मां को शहर और गांव दोनों के माहौल के हिसाब से ढलते हुए देखा है। वह गांव में होती थीं, तो घर बनाने के लिए ईंट-पत्थर सिर पर ढोकर लाने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती थी।
शहर में होती थीं, तो उसी हिसाब से काम करती थीं। रेखा आर्या के पिता की मौत के बाद उनकी मां पुष्पा देवी का स्वास्थ्य तेजी से खराब हुआ है। मगर उनकी मौजूदगी उनके लिए हर पल संबल साबित होती है।
रेखा आर्या स्वीकार करती हैं कि राजकाज में रहते हुए जब भी वह दिक्कत महसूस करती हैं, तो अपनी मां के संघर्ष को याद करती हैं। वहां से उन्हें ताकत मिलती है। रेखा आर्या के मुताबिक, उनकी मां सिर्फ पांचवीं पास थीं, लेकिन उनके लिए बडे़-बडे़ सपने देखे। पढ़ाया-लिखाया और आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रेरित किया।