हल्द्वानी में लापता होने के बाद लाडली से हुई हैवानियत ने जनमानस को तो झकझोरा ही न्यायपालिका ने भी इसका संज्ञान लिया।
जिगर के टुकड़ों से मिलने की आस बंधी
नैनीताल हाईकोर्ट ने पुलिस से राज्य में गुमशुदा बच्चों की जानकारी मांगी है। अदालत के इस रुख के बाद प्रदेश के उन 85 परिवारों को अपने जिगर के टुकड़ों से मिलने की आस बंधी हैं जिनके मासूम बच्चे उनसे जुदा हो गए हैं।
जिन लोगों के मासूम बच्चे गायब हैं उनका पुलिस पर आरोप है कि वह बच्चों की खोजबीन के लिए कुछ भी नहीं करती। हालांकि पिछले दिनों देहरादून के आदर्श नगर से गायब बच्चे को पुलिस ने खोज निकाला लेकिन यह मामला एक अपवाद ही कहा जाएगा।
गायब बच्चों और लोगों को तलाशने में पुलिस कितनी गंभीरता दिखाती है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य गठन के 14 वर्षों में लापता हजारों लोगों की गुमशुदगी कागजों में दम तोड़ चुकी है।
बीते 11 माह में लापता 366 लोगों को खोजना तो दूर पुलिस ऐसा कोई साक्ष्य तक नहीं जुटा सकी है, जिससे पता चल सके कि वे जिंदा भी हैं। ऐसे में न सिर्फ लोगों का आक्रोश बढ़ रहा है, बल्कि कानून व्यवस्था बिगड़ने का खतरा भी पैदा हो गया है।
13 वर्षों में इनका सुराग नहीं
459 बालक लापता
233 बालिकाएं लापता
680 महिलाएं नहीं मिलीं
1362 पुरुषों का सुराग नहीं
11 माह (25 नवंबर तक) में इतने लापता
लापता - गुमशुदा - सुराग नहीं
लड़के - 123 - 51
लड़कियां - 115 - 34
पुरुष - 308 - 184
महिलाएं - 241 - 97
(आंकड़े पुलिस रिकॉर्ड पर आधारित हैं)
बच्चों की गुमशुदगी में पुलिस पहले दिन से ही गंभीरता से कार्रवाई करती है। 48 घंटे बाद गुमशुदगी अपहरण में तरमीम कर विवेचना की जाती है। कई स्तर पर समीक्षा की जाती है। पुरुषों और महिलाओं के लापता होने की कुछ और वजहें भी होती हैं। फिर भी बरामदगी के लिए प्रयास किए जाते हैं।
- राम सिंह मीणा, एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर)