देहरादून में कई अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान है, लेकिन हकीकत में वहां अल्पसंख्यक वर्ग के गरीब परिवारों के बच्चे नहीं पढ़ते। यहां पर बड़े अधिकारियों के बच्चे पढ़ते हैं, जबकि इन पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों के बच्चों का होता है। यही नहीं अल्पसंख्यक स्कूलों में राइट टू एजुकेशन (आरटीई) के तहत बच्चों को निशुल्क शिक्षा के तहत दाखिला भी नहीं मिल पाता। ऐसे में शिक्षा विभाग ने अल्पसंख्यक स्कूलों की जांच योजना बनाई है। अल्पसंख्यक स्कूल के छात्रों का धर्म के आधार पर ब्यौरा लिया जाएगा। इसके बाद ही स्कूल की मान्यता प्रक्रिया में बदलाव होगा।
मुख्य शिक्षा अधिकारी प्रदीप कुमार ने बताया कि स्कूल अल्पसंख्यक वर्ग में आ जाता है तो फिर 25 फीसदी छात्रों को आरटीई के तहत दाखिला नहीं मिलता। अल्पसंख्यक के नाम पर स्कूल खोल लेते हैं, लेकिन स्कूल अपनी कम्युनिटी के गरीब परिवार के बच्चों का दाखिला नहीं करते हैं। जबकि सामान्य वर्ग के हाई क्लास परिवार के बच्चे का दाखिला ले लेते हैं। इसके बड़े उदाहरण दून इंटरनेशनल स्कूल, सेंट जोसेफ, सेंट थॉमस आदि हैं। यह सभी अल्पसंख्यक के नाम पर स्कूल चला रहे हैं। ऐसे स्कूलों में बच्चों के धर्म संबंधी जानकारी ली जाएगा।
नए अल्पसंख्यक स्कूल से क्या फायदा
देहरादून में अल्पसंख्यक वर्ग के करीब 22 स्कूल हैं। इनके अलावा एक स्कूल ने अल्पसंख्यक में शामिल होने के लिए आवेदन किया है। उस स्कूल में कुल 1200 बच्चे हैं। जिसमें अल्पसंख्यक वर्ग के सिर्फ 19 बच्चे हैं। यही नहीं, उस कम्युनिटी के अल्पसंख्यक स्कूल जिले में पहले से ही चल रहे हैं। ऐसे में उस विशेष कम्युनिटी के बच्चों को नए स्कूल से क्या लाभ मिलेगा। यह मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने अल्पसंख्यक स्कूलों की जांच शुरू कर दी है।
50 फीसदी मैनेजमेंट स्टाफ उसी कम्युनिटी का होना चाहिए
अल्पसंख्यक स्कूलों में 50 फीसदी से अधिक मैनेजमेंट स्टाफ उसी कम्युनिटी का होना चाहिए। इसके अलावा शिक्षा विभाग स्कूलों में पता करेगा कि जिस कम्युनिटी का स्कूल है वहां पर उस कम्युनिटी के कितने बच्चे पढ़ रहे हैं। स्कूल अल्पसंख्यक के दायरे में है या नहीं। इससे यह पता चलेगा कि जिले में कितने अल्पसंख्यक स्कूल हैं और कितने स्कूलों की जरूरत है।