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छोटे गांव को भूतहा होने से बचा सकते हैं बड़े गांव

Mon, 01 Feb 2016 09:50 AM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड को पलायन की विभीषिका से बचाने का करिश्मा यहां के बड़े गांव कर सकते हैं। पौड़ी के ऐसे ही गांवों के लोगों ने पिछले 15 वर्षों में इसे साबित कर दिखाया है।
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वहां के छोटे गांव जहां ‘भूतहा’ गांवों में तब्दील हो चुके हैं, वहीं बड़े गांव फल-फूल रहे हैं। बड़े गांवों के लोग खेती भी कर रहे हैं और अपने लिए स्थानीय स्तर पर बाजार भी विकसित कर रहे हैं। बताते चलें कि राज्य गठन के बाद से ही पहाड़ में पलायन तेज हुआ है।

पहले जहां परिवार का एक सदस्य विस्थापित हो रहा था, वहां अब पूरा-पूरा परिवार गांव छोड़कर शहर का रुख कर रहा है। पलायन की इसी तीव्र दर का सबब है कि प्रदेश में इस समय गैर आबाद गांवों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। ऐसे में प्रदेश के ये बड़े गांव उम्मीद की रोशनी की तरह हैं।
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पौड़ी जिले में 150 से अधिक परिवार वाले ऐसे करीब तीन फीसदी गांव है जिनकी जनसंख्या 2001 के मुकाबले 2011 में बढ़ी है। यह तब है जब पौड़ी और अल्मोड़ा देश के एकमात्र ऐसे जिले हैं, जहां दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर (दस साल में बढ़ने वाली जनसंख्या) बढ़ने की बजाय घटी है।

राष्ट्रीय ग्राम्य विकास शोध संस्थान के एक अध्ययन ने इसकी पुष्टि भी की है। अध्ययन की मानें तो पौड़ी जिले में बड़े गांव बचे हुए हैं, जबकि छोटे गांव पूरी तरह खाली होने की कगार पर हैं। अल्मोड़ा में भी पौड़ी की ही कहानी दोहराई जा रही है। जिले में 150 से अधिक परिवार वाले करीब छह फीसदी गांव हैं, जिनकी जनसंख्या घटने की बजाय बढ़ी है। वहीं 100 परिवार तक के गांवों की जनसंख्या कम हुई है।

अपना सकते हैं कलस्टर अप्रोच
गांवों को एक कलस्टर के रूप में विकसित कर छोटे गांवों को पलायन की विभीषिका से बचाया जा सकता है। विशेषज्ञ यह मान रहे हैं, लेकिन इनका कहना है कि  इसके लिए पहले पायलट आधार पर परीक्षण किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय ग्राम्य विकास संस्थान के पूर्व निदेशक बीपी मैठाणी इसी आधार पर गांवों को सामूहिक खेती से जोड़ने का प्रस्ताव सरकार को दे चुके हैं।

मुडेंती
टिहरी जिले में घनसाली तहसील में एक गांव है मुंडेती। वर्ष 2000 में इस गांव में करीब 45 परिवार थे। अब 2016 में केवल पांच परिवार ही रह गए हैं। गांव में खेती बरसात पर आधारित है। यहां अब बर्फबारी भी नहीं होती। चीड़ का जंगल गांव के आसपास तेजी से फैल रहा है। गांव से करीब एक किलोमीटर दूर सड़क है और अब गांव के नजदीक दूसरी सड़क पहुंचाई जा रही है। सरकारी हाई स्कूल भी एक किलोमीटर की दूरी पर है और चार किलोमीटर की दूरी पर है उच्चतर माध्यमिक स्कूल। गांव से पलायन की वजह रोजगार की तलाश ही अधिक मानी जा रही है।

अखोड़ी
टिहरी में ही मुंडेती से करीब तीन किमी की दूरी पर है गांव अखोड़ी। करीब 300 परिवारों के इस गांव में अब एक स्थानीय बाजार विकसित हो चुका है। गांव में उच्चतर माध्यमिक स्कूल है। एक अंग्रेजी माध्यम का स्कूल भी खुल गया है। अस्पताल भी है और हैलीपैड भी। गांव से पलायन हुआ है पर इसकी दर आसपास के गांवों के मुकाबले कम है। उत्तराखंड के गांधी कहे जाने वाले इंद्रमणी बड़ोनी के इस गांव से आसपास के कई गांव जुड़े हुए हैं। यहां के निवासी विनोद बड़ोनी की माने तो खेती अब भी गांव की आजीविका का मुख्य आधार है। स्थानीय स्तर पर रोजगार कम है।

शहरीकरण की प्रक्रिया से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र अछूते नहीं है। बड़े गांव कस्बों में तब्दील हो रहे हैं और कस्बे शहरों में बदल रहे हैं। जरूरत है तो इस प्रक्रिया को समझकर जरूरत के हिसाब से नीतियां बनाने की। इन बड़े गांवों और कस्बों को आर्थिक गतिविधि का केंद्र बनाकर पलायन की रफ्तार को रोका जा सकता है।
- इंदु कुमार पांडे, सलाहकार मुख्यमंत्री

सरकारों का हाल यह हो गया है कि योजनाओं के केंद्र में परिवार है। इससे योजनाओं का लाभ बिखर जाता है। पांचवीं पंचवर्षीय योजना में रूलर ग्रोथ सेंटर को तवज्जो देने के लिए कहा गया था। इसके बाद से ही यह नजरिया बदल गया। मैं इस बात से सहमत हूं कि रूलर ग्रोथ सेंटर को तवज्जो देकर पलायन को रोका जा सकता है। रूलर ग्रोथ सेंटर से हमारा मतलब है, ऐसे बड़े गांव जो आसपास के गांवों के आर्थिक आधार भी हों।
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- बीपी मैठाणी, पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय ग्राम्य विकास संस्थान
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