तुम्हें बुला रहा मैं तुम्हारा बूढ़ा घर, कंक्रीट-अरण्यों से चले आओ निकलकर। माना तुम्हारे पास होंगे आकाशचुंबीय भवन,परंतु क्या ये घरौंदा नहीं अब तुम्हें स्मरण। खेले-कूदे जिसकी गोदी में, धूल-मिट्टी से सन, जहां तुमने बिताया अपना प्यारा नन्हा सा बचपन।...डॉ. कविता भट्ट ने यह मर्मस्पर्शी रचना बलोनी और बर्सू जैसे गांवों के लिए ही लिखी है। गांव जो अब भूतिया कहे जाते हैं। गांव जो वीरान हो गए।
बचे हैं तो बस बूढ़े घर। ये अपनों को पुकारते हैं लेकिन इनकी आवाज दीवारों से टकराकर वापस लौट आती है। कुछ इंतजार में खड़े हैं तो कुछ थक-हारकर ढह गए। इन मिट्टी के आंगनों में कभी कोई घुटमन चला था। जन्म, ब्याह और सभी उत्सवों में ये आंगन-भीत हुलसती थीं।