बिहार में मिड डे मील 22 मासूमों की जिंदगी लील गया। भगवान न करे, कभी ऐसा हो लेकिन उत्तराखंड के स्कूलों में योजना के जो हालात हैं, वे बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से कतई भरोसे लायक नहीं।
राज्य में योजना सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मिड डे मील योजना मई वर्ष 2002 में शुरू की गई थी। जिसे प्रदेश के 17716 सरकारी एवं सहायता प्राप्त स्कूलों में संचालित किया जा रहा है। लेकिन 12 साल बाद भी 7000 स्कूलों में भोजन बनाने के लिए किचन की व्यवस्था नहीं की जा सकी है।
आपदा के बाद विभिन्न जिलों में 31 किचन भी ध्वस्त हो गए हैं। इन स्कूलों में मिड डे मील खुले आसमान के नीचे बनाया जाता है। इससे हर वक्त जहरीले कीट, छिपकली आदि के भोजन में गिरने का खतरा बना रहता है। ऐसे में कब कोई बड़ा हादसा हो जाए, कहा नहीं जा सकता।
प्रयोग हो रहे घटिया तेल, मसाले
सूत्रों की मानें तो मिड डे मील बनाने के लिए लाई जाने वाली खाद्य सामग्री की गुणवत्ता पर किसी की नजर नहीं रहती। विभाग की ओर से भी इस संबंध में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है। ऐसे में भोजन पकाने के लिए घटिया तेल, मसालों का प्रयोग किया जा रहा है।
यहां यह भी बता दें कि कुछ समय पूर्व एमडीएम में चावल की गुणवत्ता खराब पाए जाने के बाद विजिलेंस जांच का आदेश दिया गया था, लेकिन यह जांच फाइलों में ही दबकर रह गई।
गंभीर नहीं शासन-प्रशासन
स्कूलों में बच्चों के भोजन के लिए राज्य और जनपद स्तर पर अनुश्रवण एवं मूल्यांकन समिति गठित हैं। जनपद स्तर पर इसका अध्यक्ष जिलाधिकारी और राज्य स्तर पर मुख्य सचिव हैं। सांसद और विधायक भी समिति में बतौर सदस्य शामिल रहते हैं। लेकिन मुख्य सचिव ने कभी स्कूलों में जाकर योजना का निरीक्षण नहीं किया है।
यह भी बताया जाता है कि कई जिलों में तो जिलाधिकारियों ने भी स्कूलों का रुख नहीं किया है। सांसद और विधायकों के भी समिति की बैठक में न आने की बात बताई जा रही है। दूसरी ओर, तीन नियमित कर्मचारियों को छोड़ दें तो प्रदेश में योजना का संचालन आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे ही चल रहा है। किसी भी स्तर पर इन कर्मचारियों की जवाबदेही तय नहीं है।
यहां क्लास में रखा राशन
दून में जूनियर हाईस्कूल बंजारावाला का मिड डे मील, हाईस्कूल बंजारावाला की क्लास में रखा है। इसी क्लास में बच्चे भी पढ़ते हैं। प्राथमिक विद्यालय डोभालवाला में राशन रखने की जगह ही नहीं है। यहां राशन बरामदे में पड़ा है। कई स्कूल ऐसे हैं, जहां राशन कमरों में तो है लेकिन बरसात में टपकती छतों से यह खराब हो रहा है। कक्षाओं में बच्चे भी भीग रहे हैं।
दिक्कत बजट की भी
योजना के लिए प्राथमिक विद्यालयों में प्रति बच्चा 3.34 रुपये और जूनियर हाईस्कूलों में पांच रुपये दिया जाता है। इसके बावजूद प्रबंधन समिति को कहा गया है कि बच्चों को बेहतर पोषण वाला भोजन, हरी सब्जियां, दालें आदि अनिवार्य रूप से दी जाएं। कई स्कूलों में अब तक गैस कनेक्शन की भी व्यवस्था नहीं है। ऐसे में कई बार शिक्षक अपनी जेब से रकम चुकाकर किसी तरह योजना को चलाए रखते हैं।
'आपदा के बाद 45 क्विंटल राशन भीगकर खराब हो चुका है। स्कूलों में मसाला, तेल और सब्जियों के इस्तेमाल की जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन समिति की है। समितियों को निर्देश दिया गया है कि उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री ही प्रयोग की जाए। जिन स्कूलों में खुले में भोजन बन रहा है, उन स्कूलों में किचन कम स्टोर रूम बनाया जाएगा।'
पद्मेंद्र कुमार बिष्ट, संयुक्त निदेशक एमडीएम