सरहद पर देश के लिए मर मिटने वालों के परिवारीजनों के लिए सरकारें भले ही बड़े-बड़े दावे करती हो मगर वास्तविकता इसके उलट है। अफसरों की लापरवाही से शहीदों के परिवारों को वह सम्मान नहीं मिल पाता जिसके वह हकदार हैं। जीवंत पर्यंत वे हक की लड़ाई के लिए संघर्ष करते रहते हैं।
बिंदुखत्ता की उमा जोशी भी उनमें से एक है। शादी के दस दिन बाद ही पति सीमा पर शहीद हो गया। तब से उन्हें आधी-अधूरी विधवा पेंशन मिल रही थी। अब उन्होंने लड़ाई लड़ी तो जिला सैनिक कल्याण अधिकारी ने पूरी मदद की। नतीजतन 39 साल बाद हक मिला है। अब उन्हें पूरी पेंशन और लाखों का एरियर मिला है।
गौलापार की रहने वाली उमा जोशी की शादी नौ मई 1978 को अल्मोड़ा जिले के धौलाड़ सोमेश्वर निवासी फौजी जगदीश चंद्र से शादी हुई थी। शादी के एक सप्ताह बाद पति ड्यूटी करने के लिए चले गए। 19 जून 1978 को उनके शहीद होने की खबर आ गई। पति की मौत के कुछ दिनों बाद उमा मायके चली आईं। पिता ने उन्हें भविष्य निधि कार्यालय में नौकरी दिलाई लेकिन सदमे के चलते वह ज्यादा दिनों तक नौकरी नहीं कर सकीं।
इसके बाद काठगोदाम कालीन फैक्ट्री में काम दिलाया। इसी दौरान उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा पास कर ली और शिक्षा विभाग में चतुर्थ श्रेणी में नौकरी मिल गई। इस बीच उमा के ससुर ने अपने बेटे की आधी पेंशन अपने नाम करा ली थी। इसकी भनक उमा को नहीं लगी। 1989 में ससुर की भी मौत हो गई। उमा अपनी आधी पेंशन से गुजारा कर रही थी।
पेंशन की राशि नहीं बढ़ने पर तीन महीने पहले लोगों ने उन्हें सैनिक कल्याण कार्यालय जाने की सलाह दी। यहां जिला सैनिक कल्याण अधिकारी मेजर बीएस रौतेला ने कागजात देखने के बाद बैंक अधिकारियों से पत्राचार किया। परिणाम यह निकला कि उमा को पूरी पेंशन करीब 22 हजार रुपये प्रतिमाह के साथ लाखों रुपये एरियर के रूप में मिल गया।
मोहनी देवी को भी 33 साल बाद मिला न्याय
हैड़ाखान देवली की मोहनी की कहानी भी ऐसी ही है। पांच कुमाऊं रेजीमेंट में तैनात पति पूर्णानंद की जून 1983 में मौत हो गई थी। कम पढ़ी-लिखी होने के कारण मोहनी सामान्य पेंशन से गुजारा करती थी। मोहनी का एक बेटा और तीन बेटियां हैं। बच्चों की पढ़ाई करने के लिए मोहनी बिंदुखत्ता में रहने लगीं। लोगों के कहने पर मोहनी ने जिला सैनिक कल्याण अधिकारी से संपर्क किया। जिला सैनिक कल्याण अधिकारी मेजर बीएस रौतेला ने बैंक ऑफ बड़ौदा के उच्चाधिकारियों के समक्ष आरटीआई के तहत जवाब मांगा। काफी प्रयास के बाद मोहनी को भी पूरी पेंशन 21377 रुपये मिलने लगे हैं। जबकि पहले मोहनी को साढ़े दस हजार रुपये मिल रहे थे। इसके अलावा 33 वर्षों के एरियर का भुगतान भी बैंक ने कर दिया है।
बैंकों की लापरवाही सामने आई
सैनिक की दोनों विधवाओं के मामले में बैंक अधिकारियों की लापरवाही प्रकाश में आई है। बैंक अधिकारियों ने जांच नहीं की कि वास्तविक रूप से किसे कितनी पेंशन मिलनी चाहिए। जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास अधिकारी बीएस रौतेला का कहना है कि दोनों मामलों में पहले आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई। इसके बाद विभागीय पत्राचार से दोनों बुजुर्ग महिलाओं को न्याय मिला। यदि दोनों की पहले ही कार्यालय में शिकायत आती तो न्याय में देरी नहीं होती। इस प्रकार पेंशन की शिकायत भुक्तभोगी को तत्काल करनी चाहिए।