जौनसार बावर के कई गांवों में शनिवार से माघ पर्व की शुरुआत हो गई। लोगों ने देवता से सुख और शांति की कामना की। देर शाम तक गांवों में गीत-संगीत का दौर चलता रहा। लोग हारुल और तांदी नृत्य पर झूमते रहे। महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में जश्न मनाया। खान-पान के साथ ही मनोरंजन के भी विशेष प्रबंध किए गए हैं।
शनिवार को हनोल, मोहना, लोहारी, जाडी, सिजला, भंगार, सेहरा, अस्टाड, सलगा, सेंज, मंगरोली, होडा, क्वारना, ढकियारना, कोथी, रावना, पाटी, बुरास्वा, मेहरावना समेत कई गांवों में पर्व शुरुआत हो गई। सुबह लोगों ने मंदिर जाकर आराधना की। इसके बाद हथियारों की पूजा की गई। देवता को खिचड़ी का भोग लगाया गया, फिर हर घर-परिवार में एक-एक बकरे की बलि दी गई। देर शाम लोगों ने पंचायती आंगन में जमकर हारुल और तांदी नृत्य किया। क्षेत्र के शेष गांवों में रविवार से पर्व मनाया जाएगा।
कुछ लोगों के अनुसार मान्यता है कि क्षेत्र में किरमीर नामक राक्षस के आतंक से छुटकारा पाने की खुशी में मरोज पर्व मनाया जाता है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि पूर्व में जनवरी माह में पूरा क्षेत्र में बर्फ से ढक जाता था। बर्फ में कोई फसल नहीं हो पाती थी। ऐसे में इस दौरान बकरे के मांस का सेवन किया जाता था।
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वाहनों की कमी से जूझते रहे लोग
चकराता। मरोज पर्व पर घर जाने के लिए लोगों को वाहनों की कमी से जूझना पड़ा, जिसके चलते लोगों को छोटे वाहनों पर ओवरलोड सफर को मजबूर होना पड़ा।
मालूम हो कि मरोज पर्व का हिस्सा बनने के लिए नौकरी पेशा लोग भी अपने घरों पर पहुंचते हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में लोगों के घरों की ओर रुख करने के कारण वाहनों की कमी पड़ गई। जिस कारण लोगों को घर पहुंचने की आपाधापी में छोटे वाहनों में ओवरलोड होकर सफर करने को मजबूर होना पड़ा। दिल्ली में नौकरी कर रहे जगथान निवासी कुंवर सिंह, जोगियो के सब्बल सिंह, मझगांव के सियाराम आदि का कहना है कि चकराता पहुंचने के बाद उन्हें वाहनों के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा। स्थानीय निवासी रमेश रावत, सालकराम, वीरेंद्र जोशी, रणवीर सिंह, चमन, केशर चौहान आदि का कहना है कि अक्सर पर्याप्त बसें नहीं चलने के कारण यातायात की समस्या बनी रहती है।