कोई भी साथ चलने को भी राजी न हुआ
इसके बाद वह 17 वर्ष तक वहां जाते रहे लेकिन परीक्षा की घड़ी आई 2002 में जब माओवाद के दौर में नेपाल हिंसा की चपेट में आ गया और एक एक महीने तक के माओवादियों के नेपाल बंद जैसे विरोध प्रदर्शन आम हो गए। तब सभी लोगों ने उनसे जोखिम न लेने और नेपाल न जाने को कहा और कोई भी साथ चलने को भी राजी न हुआ, लेकिन दृढ़ इच्छा शक्ति से वह अकेले ही रवाना हो गए और दो सौ किमी से ज्यादा पैदल यात्रा कर जंगलों में भटक कर और कई बार दिन भर भूखे, प्यासे बिता कर भी यात्रा पूरी की।
अगले दो वर्ष वहां के हालात और भी बिगड़ गए लेकिन खाती जान हथेली पर रख कर हर वर्ष फिर भी वहां हर वर्ष जाते रहे। हालात सामान्य होने पर खाती 10 वर्षों तक अपनी पत्नी को भी साथ ले गए। खाती बताते हैं पहले वह बंगाल से कंचनपुर होकर जाते थे, फिर बिहार के रक्सौल विराटनगर होते हुए जाने लगे, उसके बाद गोरखपुर अयोध्या भैरवा होकर जाने लगे। अब महेंद्रनगर बुटवल पोखरा होकर जाते हैं। महेंद्रनगर से काठमांडू 800 किमी मार्ग भारत की मदद से बना है जो बहुत बढ़िया बनाया गया है।
खाती बताते हैं इन 35 वर्षों में वहां भी व्यापक परिवर्तन आया है। पहले वहां हिप्पी कल्चर था। नशे का बेहद ज्यादा चलन था। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार चरम पर था, अब इनमें बहुत बदलाव आया है। लोग रोजगार के प्रति जागरूक हुए हैं लेकिन समाज में गरीब, अमीर के बीच की खाई बहुत गहरी है। एक ओर भारी गरीबी है तो एक वर्ग हॉलीवुड स्टाइल में जीवन जी रहा है। खाती ने बताया कि वहां से श्रमिक, कुली के रूप में रोजगार की तलाश में भारत आने के बजाय लोग अब दुबई, खाड़ी देशों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
पर्यटन को लेकर बचपन से ही दीवानगी की हद तक जुनून
सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही तो ये जवानी फिर कहां। राहुल सांकृत्यायन ने जब ये प्रसिद्ध उक्ति कही थी तो शायद उन्हें भी भरोसा नहीं रहा होगा कि उनकी नसीहत पर कोई इस सीमा तक अमल करेगा, पर खाती ने ऐसा ही किया। खाती के दिल में पर्यटन को लेकर बचपन से ही दीवानगी की हद तक जुनून था।
संयोग से उन्हें अपने जैसा शौक रखने वाले राजा साह, राजीव पांडे, योगेश साह का साथ मिल गया। 1976 में डिग्री कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वह बगैर जेब में पैसे के विश्व भ्रमण पर निकल पड़े। उन्होंने मुख्यत: सड़क मार्ग से महीनों की यात्रा कर अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, जॉर्डन, सीरिया, मिश्र, ग्रीस, इटली, यूगोस्लाविया, बुल्गारिया का भ्रमण किया। खाती बताते हैं कि इस दौरान उन्होंने ईरान में निर्माण कार्य में श्रमिक, सीरिया की फैक्ट्री में, जॉर्डन में होटल में काम कर खर्चा जुटाया।
इनके परिवारजनों की तो इनकी सुरक्षित वापसी की उम्मीद भी टूटने लगी थी। बाद में खाती ने इन साथियों के साथ नेपाल सहित उत्तराखंड के अनेक ग्लेशियर, बुग्यालों की भी यात्रा की। वह अमेरिका, चीन, यूरोप सहित विश्व के कई देशों का भ्रमण कर चुके हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी हर वर्ष किसी नए देश की यात्रा अवश्य करते हैं। अपने शौक को ही व्यवसाय भी बना चुके खाती ने युवाओं को पर्यटन के प्रति जागरूक करने को 1982 में नैनीताल में यूथ टूरिज्म डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन की स्थापना भी की।