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लाइलाज बीमारी से लड़कर बनाया अपना मुकाम, पढ़े जज्बे की सच्ची कहानी...

Mon, 18 Apr 2016 01:43 PM IST
आफताब अजमत/ अमर उजाला, देहरादून
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आशुतोष इलाहाबाद बैंक में बतौर बैंक पीओ ज्वाइन करने जा रहे हैं।
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देहरादून के आशुतोष ने लाइलाज बीमारी से लड़कर अपना मुकाम बनाया है। 23 साल पहले उस वक्त आशुतोष के घर में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा जब परिजनों को पता चला कि उनका बेटा मायोपिया (लो विजन) की बीमारी से पीड़ित है।
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तब आशुतोष चार साल के थे। आशुतोष की ऑप्टिक नर्व बेहद पतली होने की वजह से वे वह साफ नहीं देख पाते। बीमारी लाइलाज है, लिहाजा मां ने आशुतोष को राष्ट्रीय दृष्टिबाधित संस्थान (एनआईवीएच) में भेज दिया। कुछ दिनों की मेहनत के बाद आशुतोष की जिंदगी को नई राह मिल गई। हाल ही में जारी हुए आईबीपीएस के नतीजों में आशुतोष ने बैंक पीओ बनकर मिसाल कायम की है।

दून के विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए चलने वाले चेशायर होम में वार्डन ममता गुप्ता का बेटा आशुतोष आज न केवल विशेष आवश्यकता बल्कि हर युवा के लिए मिसाल है। आशुतोष गुप्ता को चार साल की उम्र में मायोपिया नाम दृष्टि से संबंधित बीमारी का पता चला। इसके बाद अभिभावकों ने उसे एनआईवीएच और फिर शार्प मेमोरियल भेजा।
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यहां उन्होंने खूब मेहनत करके अपनी इस कमजोरी को ही अपना मजबूती बना ली। शार्प मेमोरियल से पांचवीं करने के बाद इंडियन कैंब्रिज स्कूल से फर्स्ट डिवीजन के साथ 10वीं पास की। इसके बाद टचवुड स्कूल से फर्स्ट डिवीजन के 12वीं करने के बाद आशुतोष ने यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज (यूपीईएस) से बीबीए पास किया।
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इलाहाबाद बैंक में बतौर बैंक पीओ करेंगे ज्वाइन

- फोटो : pti
मां, ममता गुप्ता ने बताया कि कुछ दिन आशुतोष ने एक एनजीओ में काम किया। फिर दोबारा बैंक पीओ की तैयारी शुरू की। कड़ी मेहनत के बाद आशुतोष ने पहले प्रयास में ही इस साल आईबीपीएस की परीक्षा पास कर ली।

आशुतोष अब इलाहाबाद बैंक में बतौर बैंक पीओ ज्वाइन करने जा रहे हैं। बचपन की दृष्टि से जुड़ी कमजोरी के बावजूद आशुतोष आज सबके लिए मिसाल बन गया।

आशुतोष को बैंक पीओ की तैयारी कराने वाले टाइम इंस्टीट्यूट के निदेशक राजीव कुकरेजा ने बताया कि उसकी आंखों में हमेशा कामयाबी का सपना था, जिसके लिए वह दिन रात एक करके मेहनत करता था। आशुतोष ने अपनी सफलता का श्रेय अपने अभिभावकों और शिक्षकों को दिया।

क्या होता है मायोपिया
मायोपिया यानी पार्शली ब्लाइंड। यह एक दृष्टि से जुड़ी कमजोरी होती है, जिसमें व्यक्ति को या तो दूर का साफ नजर नहीं आया या फिर पास का। एनआईवीएच इंटर कॉलेज के प्राचार्य कुलबीर सिंह ने बताया कि इसका कोई इलाज तो नहीं है लेकिन इसमें अगर सही वक्त पर ट्रेनिंग और अपनों का साथ मिल जाए तो हर मुश्किल आसान हो जाती है। एनआईवीएच में हर साल तमाम ऐसे बच्चे आते हैं। इसे लो विजन डिजीज भी कह सकते हैं।
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