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...जब इंदिरा गांधी के मनाने पर भी इस नेता ने नहीं लड़ा था चुनाव, ऐसे करते थे सबके दिलों पर राज

Fri, 22 Mar 2019 04:36 PM IST
अलका त्यागी राकेश खंडूड़ी/अमर उजाला, देहरादून
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इंदिरा गांधी/ डॉ.भक्तदर्शन सिंह - फोटो : गूगल
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पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ.भक्तदर्शन सिंह उन बिरले राजनीतिज्ञों में से थे, जिन्होंने उसूलों और सिद्धांतों की राजनीति की और इससे कभी नहीं डिगे। 1971 में लोकसभा चुनाव के दौरान जब इंदिरा गांधी ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए कहा तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया।

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उन्होंने इंदिरा से कहा कि अब नए लोगों को मौका देना चाहिए। आज की राजनीति में नए लोगों को मौका देने की बातें तो खूब होती हैं, लेकिन इन पर अमल करने वाले कम ही उदाहरण मिलते हैं। लेकिन भक्तदर्शन ने इंदिरा से जो कहा, उसे जीवन भर निभाया। एक बार सक्रिय राजनीति से मुंह फेरा तो फिर उस ओर झांका तक नहीं।

50 से 60 के दशक तक गढ़वाल की सियासत में भक्तदर्शन सिंह बहुत बड़ा नाम था। आजादी के बाद 1951 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में भक्तदर्शन गढ़वाल सीट से कांग्रेस के टिकट पर पहली बार सांसद चुने गए। 

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भक्तदर्शन ने 68.81 फीसद मत प्राप्त कर शानदार जीत दर्ज की। उस समय गढ़वाल सीट में मुरादाबाद तक का क्षेत्र शामिल था। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 1957, 1962, 1967 के लोकसभा चुनाव में भक्तदर्शन बार-बार चुनाव जीतते गए।
 
भक्तदर्शन के रूप में गढ़वाल सीट कांग्रेस की जीत का पर्याय बन चुकी थी। वह भक्तदर्शन की राजनीति का स्वर्णिम दौर था। देश की राजनीति में उनका तगड़ा दखल था। नेहरू कैबिनेट में वे केंद्रीय शिक्षा मंत्री तक रह चुके थे।

लेकिन राजनीतिक करियर के सबसे अच्छे दौर में भक्तदर्शन ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। उनके इस कदम ने उस दौर की सबसे ताकतवर राजनेता इंदिरा गांधी को स्तब्ध कर दिया था।
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भक्तदर्शन ने 1971 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। जब भक्तदर्शन का सक्रिय राजनीति से मोहभंग हुआ तो उनकी आयु 59 वर्ष थी। वर्तमान दौर की राजनीति में इस आयुसीमा के कई राजनेता चुनाव लड़ने को मचल रहे हैं।

जो ज्यादा उम्रदराज हैं, वे अपनी राजनीतिक विरासत अपने पुत्र, पुत्रियों व रिश्तेदारों के लिए छोड़ जाना चाहते हैं। ऐसे दौर में भक्तदर्शन एक मिसाल हैं। यही वजह है कि जब-जब उसूलों की सियासत की बातें होती हैं, तो भक्तदर्शन का जिक्र करना कोई नहीं भूलता।

केंद्रीय मंत्री से लेकर प्रतिष्ठित संस्थानों के निदेशक व विवि के कुलपति रहे भक्तदर्शन का जीवन किराये के मकान में गुजरा। 30 अप्रैल 1991 को उन्होंने देहरादून में अंतिम सांस ली।
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