उन्हें मनाने की हरसंभव कोशिश नाकाम रही। आखिरकार जनरल के शिष्य माने जाने वाले पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत को पौड़ी से टिकट देना पड़ा। अब भाजपा के सामने बड़ी चुनौती है कि जनरल को चुनाव प्रचार में कैसे सक्रिय रखा जाए? खंडूड़ी का प्रभाव पौड़ी ही नहीं बल्कि अन्य सीटों पर भी है। उधर, कुमाऊं में कोश्यारी का बड़ा रुतबा है। पार्टी के भारी दबाव के बावजूद वे चुनाव नहीं लड़ने के अपने एलान पर अडिग रहे।
राजपूत मतदाताओं में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। जातीय समीकरणों को ध्यान में रख प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को कोश्यारी ने अपना विकल्प चुना। खटीमा से तीन बार के विधायक और कोश्यारी के करीबी माने जाने वाले पुष्कर सिंह धामी रेस से बाहर हो गए। मोदी लहर में वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव हार चुके भट्ट के लिए नैनीताल क्षेत्र नया है। अब कोश्यारी की सक्रियता भाजपा की जीत हार में अहम रहेगी।
कोश्यारी ने भरोसा दिया है कि प्रचार में पूरा सहयोग देंगे, लेकिन भट्ट को अपनी स्वीकार्यता साबित करनी होगी। बड़ी चिंता यह है कि उनके पास तीन सप्ताह से कम समय है। उनकी सियासी डगर और मुश्किल हो सकती है, अगर कांग्रेस नैनीताल से हेैवीवेट हरीश रावत को उतारती है। जिसकी पूरी संभावना है।