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...तो इस तरह कांग्रेस काट सकती थी मोदी लहर

Sun, 18 May 2014 03:15 PM IST
विजय त्रिपाठी/ अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड में पिछले साल जून में जल प्रलय आई थी, करीब 11 महीने बाद अब एक और प्रलय आई जिसमें सत्तारूढ़ सरकार के सारे आकलन-अनुमान ढह गए।
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इस मत प्रलय के इतने भयंकर होने का अंदाज लगाने में रावत सरकार ठीक वैसे ही विफल रही, जैसे तत्कालीन बहुगुणा सरकार जल प्रलय का आभास नहीं कर सकी थी।

बहुगुणा को उनकी अदूरदर्शिता का खामियाजा कुर्सी गंवाकर भुगतना पड़ा तो रावत को सभी पांच की पांच लोकसभा सीटें।

जनता की नाराजगी का आलम यह कि कांग्रेसी मिजाज की समझी जाने वाली नैनीताल-ऊधमसिंह नगर की सीट पर मतों के लिहाज से भाजपा प्रत्याशी भगत सिंह कोश्यारी ने वर्ष 1977 के बाद से अब तक की सबसे बड़ी जीत करीब दो लाख 84 हजार वोटों से दर्ज की।
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नतीजों का विधानसभा क्षेत्रवार विश्लेषण

संसदीय चुनाव के इन नतीजों का अगर विधानसभा क्षेत्रवार विश्लेषण करें तो कुल 70 सीटों में से महज छह पर कांग्रेस आगे रही और इनमें से भी चार सीटें मुख्यमंत्री के क्षेत्र हरिद्वार की हैं।

जनता की नाराजगी का पैमाना भाजपा को कांग्रेस से 21 फीसदी से भी ज्यादा मिले वोट प्रतिशत से भी झलकता है। साफ है कि राज्य में इस बार जो करीब 10 फीसदी वोट ज्यादा पड़े वे भाजपा के खाते में गए।

नतीजे बताते हैं जैसे कांग्रेस कहीं फाइट में थी ही नहीं। मोदी का अभेद्य अंडरकरंट था। लेकिन इसकी काट या कहें असर कम किया जा सकता था अगर आपदा के बाद उपजी मुश्किल स्थितियों पर संतोषजनक काम किया गया होता।

कांग्रेस को दोहरा नुकसान

कांग्रेस को केंद्र और राज्य दोनों जगह सत्ता में होने का दोहरा नुकसान हुआ।

सरकार के नेतृत्व परिवर्तन के बाद भी स्थितियों में उल्लेखनीय सुधार न होने से जनता की नाराजगी कायम रही। इसका संकेत टिहरी और हरिद्वार सीट के नतीजे हैं।

टिहरी बहुगुणा की पारंपरिक सीट है जहां उनके बेटे साकेत ऐतिहासिक अंतर से हारे तो हरिद्वार मुख्यमंत्री हरीश रावत की सीट है जहां से वे पिछली बार सांसद बने और इस बार अपनी पत्नी को यहां से लड़ाया।

खुद मुख्यमंत्री ने अपनी 90 फीसदी ऊर्जा सिर्फ हरिद्वार सीट पर झोंक कर अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी, वहीं के नतीजे से अगर कोई निष्कर्ष निकाले तो जनादेश सीधे-सीधे उनके कामकाज के खिलाफ गया।

नई सरकार को कुछ कर दिखाने का वक्त ही नहीं मिला...दो महीने ही हुए थे कि सिर पर चुनाव आ टपका....अब कोई करे भी तो क्या, आचार संहिता लग गई....देखिए रात-रात भर तो काम कर रहे हैं, अब रिजल्ट आने में समय लगेगा...

ऐसे तमाम कच्चे-पक्के तर्क, वितर्क, कुतर्क सामने आए, अब इन्हें पचाना है या नहीं, जनता पर छोड़ दीजिए, जैसी भी उसकी पाचन शक्ति हो। उसे आश्वासनों का चूरन कब तक फंकाते रहेंगे।

सरकार से यात्रा स्थगित किए जाने की गुहार

प्रतिष्ठा का प्रश्न बनी चारधाम यात्रा शुरू तो करा दी गई लेकिन हालात ऐसे हैं कि खुद पंडित जसराज का कार्यक्रम वहां दो बार टाला जा चुका है और भविष्य में होना भी मुश्किल है।

और खुद केदारनाथ के मुख्य पुजारी बार-बार सरकार से यात्रा स्थगित किए जाने की गुहार लगा रहे हैं। यात्रा एक दिन चलती है तो चार दिन टलती है, आखिर किसके लिए है ये यात्रा।

पहाड़ की अर्थव्यवस्था से जुड़ी यह यात्रा शुरू हो तो गई लेकिन स्थानीय व्यवसायियों और दुकानदारों को इससे रत्ती भर भी लाभ नहीं। उनकी नाराजगी की छाप भी चुनावी नतीजों पर साफ झलकती है।

जिस तरह इस साल फरवरी में नेतृत्व परिवर्तन हुआ उसी तरह जनता की नाराजगी को आधार बनाकर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री निशंक से कुर्सी बीसी खंडूड़ी को सौंपी गई थी तब भी जनता ने न तो खंडूड़ी से मुरव्वत बरती और न ही छह महीने बाद हुए चुनाव में उन्हें ग्रेस मार्क दिए।
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मतदाता न तो कुछ भूलता है और न ही माफ करता है

खंडूड़ी उम्मीदों के पहाड़ से फिसले तो सत्ता गंवानी पड़ी। तब भी संकेत साफ था कि मतदाता को सब्जबाग दिखाना बंद करो, वो न तो कुछ भूलता है और न ही माफ करता है।

किसी की लहर हो या न हो, लेकिन अगर पहाड़ के किसी दुर्गम गांव के ट्रांसफारमर का फ्यूज बदलने में महीना अंधेरे में गुजर जाए, किसी गर्भवती को बच्चा जनने को मीलों पैदल पहाड़ी रास्तों पर चलना पड़े।

गन्ना किसानों को भुगतान के इंतजार में अपने घर शादी-समारोह टालने पड़े, स्कूलों में मास्टरों के इंतजार में बच्चों का भविष्य खराब हो रहा हो, पुनर्वास के लिए चौमासे में डर-डर कर रात काटनी पड़े तो जनता के सब्र का बांध टूटता है।

और इस बार टूटा भी, और जो प्रचंड लहर पैदा हुई तो अनुमान-आकलन के सारे किले ध्वस्त हो गए।

जनता के बीच से उठी लहर हर लहर से बड़ी और निर्णायक होती है। ये सबक हैं और समय का तकाजा भी कि आपके पास जादू की छड़ी हो या न हो, मिले न मिले लेकिन जनता अब छलावे से बाहर आकर हकीकत से दो-चार हो रही है।

उसकी उम्मीदों की लहर भांपिए और नापिए, यही पार लगाएगी।
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