अपने राजनीतिक कैरियर में बीसी खंडूड़ी पांच बार सांसद रहे। लोकसभा के चार चुनावों में खंडूड़ी के चुनाव संयोजक तीरथ सिंह रावत ही रहे। दरअसल, वर्ष 1991 में जब पहली बार खंडूड़ी को गढ़वाल सीट से भाजपा का टिकट मिला। उस वक्त तीरथ भाजपा में नहीं थे। उस वक्त उनके पास अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय मंत्री की जिम्मेदारी थी। तीरथ ने खंडूड़ी के लिए इस चुनाव में भी मेहनत की, लेकिन वह और उनके जोड़ीदार मौजूदा राज्यमंत्री डॉ. धन सिंह रावत वर्ष 1996 में खंडूड़ी के सबसे ज्यादा करीब आए। इसके बाद तीरथ भी विद्यार्थी परिषद से भाजपा में शामिल हो गए थे।
इसके बाद हुए हर चुनाव में तीरथ सिंह रावत ही खंडूड़ी के चुनाव संयोजक रहे। संघ प्रचारक की पृष्ठभूमि वाले तीरथ सिंह रावत को वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में चौबट्टाखाल सीट से टिकट मिला और वह विधायक हो गए। इसी दौरान 2013 में वह खंडूड़ी की पहली पसंद होने के कारण भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी बन गए। विद्यार्थी परिषद के जमाने से तीरथ के करीबी रहे पौड़ी जिला भाजपा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष विकास कुकरेती के अनुसार तीरथ सिंह रावत के जीवन पर बीसी खंडूड़ी की गहरी छाप रही है। उनके राजनीतिक कैरियर को खंडूड़ी ने ही आगे बढ़ाया है और तीरथ सिंह रावत भी उनके साथ हर स्थिति में चट्टान की तरह खडे़ रहे हैं।
भाजपा के कद्दावर नेता बीसी खंडूड़ी के लिए तीरथ सिंह रावत की अहमियत का एक बड़ा उदाहरण वर्ष 1997 से जुड़ा है। इस समय लोकसभा के चुनाव घोषित हो चुके थे और गढ़वाल सीट पर भाजपा ने बीसी खंडूड़ी को प्रत्याशी बनाया था। लोकसभा के साथ ही उत्तर प्रदेश विधान परिषद के स्थानीय निकाय, पंचायतों से जुड़ी सीट के चुनाव भी हो रहे थे। खंडूड़ी ने तीरथ के टिकट के लिए पैरवी की, जबकि भाजपा का दूसरा धड़ा सुरेंद्र सिंह नेगी के पक्ष में था।
जीत खंडूड़ी की हुई और तीरथ को टिकट मिल गया। तीरथ के मुकाबले में डॉ. हरक सिंह रावत उस वक्त सामने आए थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता उमेश त्रिपाठी के अनुसार कोटद्वार की एक बैठक में भाजपा कार्यकर्ताओं से तीरथ के पक्ष में खंडूड़ी ने साफ-साफ कह दिया 'मैं भले हार जाऊं, पर तीरथ नहीं हारना चाहिए'। बहरहाल, तीरथ चुनाव जीते। वर्ष 2000 में उत्तराखंड बना तो भाजपा की अंतरिम सरकार में तीरथ सिंह रावत को राज्य का पहला शिक्षा मंत्री बनने का अवसर भी मिला।