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मिसाल बन गई दो नेताओं की दोस्ती, 44 वर्षों से हैं साथ

Sun, 07 Aug 2016 07:38 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, हरिद्वार
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leader murli manohar and ambrish kumar file photo - फोटो : file photo
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हरिद्वार में लंबे अरसे से सक्रिय दो नेता मुरली मनोहर और और अंबरीष कुमार  44 वर्षों से हरिद्वार के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में मुरली-अंबरीष नाम से मशहूर हैं।
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संघर्ष के लंबे दौर ने उन्हें एक दूसरे का पर्याय बना दिया है। दोनों मित्रों की दोस्ती एक बार हुई तो फिर कभी नहीं टूटी। एक जमाने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दोनों नाम एक साथ लिए जाते रहे हैं।

यह दोस्ती वर्ष 1972 में तब शुरू हुई जब बुजुर्गों की जमात को पीछे छोड़कर अंबरीष कुमार शहर कांग्रेस के अध्यक्ष और मुरली मनोहर महामंत्री बने। इन पदों ने दोनों को बाहर से भीतर तक मिला दिया।
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हरिद्वार से 1974 में विधानसभा चुनाव लड़ने आए सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता सहारनपुर निवासी कामरेड आरके गर्ग ने कुछ ऐसा ताना बाना बुना कि मुरली और अंबरीष एक दूसरे की अभिन्न जरूरत बन गए। 1977 में वैचारिक संघर्ष का दौर चला और दोनों के बीच स्वार्थों की तिलांजली देने का अहम निर्णय लिया गया। राजनीति के साथ साथ साहित्य और गंभीर ग्रंथों के अध्ययन की एक समान प्रवृत्ति उन्हें साथ लाई।

यहां कुछ विचित्र संयोग भी रहे। मुरली मनोहर के पिता वैद्य मोहन लाल जहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, वहीं अंबरीष के चाचा ओमप्रकाश खादी वाले जनपद के विख्यात सेनानी थे। यह भी संयोग ही है कि दोनों का विवाह वर्ष 1985 में नवंबर के महीने में ही हुआ। दोनों का ब्लड ग्रुप भी एक ही है।

दोनों ही केवल पुत्रियों के पिता हैं। शुगर रोग भी दोनों को एक साथ लगा। तत्कालीन उत्तर प्रदेश के बड़े नेता नारायण दत्त तिवारी, हेमवती नंदन बहुगुणा, मोहसिना किदवई, अंबिका सोनी, केएन सिंह आदि एक बार भी दोनों में से किसी एक से तब तक नहीं मिले, जब तक दूसरा न आ जाए।

बड़े नेताओं को अंबरीष अकेले नहीं अपितु मुरली मनोहर के साथ ही पसंद आते थे। गहन कानूनी और संवैधानिक विषयों की पुस्तकों का प्रेम दोनों को साथ लाया। अंबरीष कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन में अनेक दलों की यात्राएं की। कभी भी मुरली ने उनका साथ नहीं छोड़ा।

यह दोनों दोस्त आज भी दोस्ती के नाम पर पंचपुरी में मिसाल की तरह हैं। विवाह आदि समारोह में दोनों में से कोई भी अकेला कभी नहीं जाता। यह भी संयोग ही है कि ऐसा कोई अवसर नहीं आया जब केवल एक को ही बुलावा भेजा गया हो।
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