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भू कानून समिति की रिपोर्ट: ...तो भूमि की लूट रोकने का कवच बनेंगी सिफारिशें, विपक्ष ने उठाए सवाल

Tue, 06 Sep 2022 06:51 PM IST
अलका त्यागी अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून

सार

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट कहते हैं कि सिफारिशें राज्य में भू सुधार की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगी और राज्य में भूमि बंदरबाट रोकने और विकास की गति को बनाए रखने में मददगार साबित होंगी।
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सीएम पुष्कर सिंह धामी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भू कानून समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद सत्तापक्ष यह मान रहा है कि उसकी सिफारिशें प्रदेश में भूमि की लूट को रोकने के लिए कवच का काम करेंगी। वहीं, विपक्ष की शंका है कि समिति ने इसमें बहुत ज्यादा बदलाव नहीं किए हैं। अब भी इसमें कई छेद हैं, जिनके जरिये प्रदेश में जमीन की लूट जारी रहेगी। कहा कि यदि सरकार की नीयत साफ है तो वह श्वते पत्र लेकर आए, ताकि यह पता चल सके कि पिछले पांच सालों में कितनी जमीनों की खरीद-फरोख्त हुई और उस भूमि का किस प्रयोजन के लिए प्रयोग किया गया। 

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भू-कानून: अध्ययन और परीक्षण के लिए गठित समिति ने सीएम धामी को सौंपी रिपोर्ट, पढ़िए ये खास बातें

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट कहते हैं कि सिफारिशें राज्य में भू सुधार की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगी और राज्य में भूमि बंदरबाट रोकने और विकास की गति को बनाए रखने में मददगार साबित होंगी। वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी के पूर्व विधायक मनोज रावत भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के दावे से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। उनका कहना है कि प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले उठे भू-कानून परिवर्तन के शोर को तत्कालीन सरकार ने एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर दबा दिया था। 
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 वर्ष 2018 में त्रिवेंद्र सरकार ने उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश और भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950) की धारा- 154 और 143 में उपधाराएं जोड़कर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में औद्योगिक प्रयोजन के लिए कितनी भी जमीन खरीद का रास्ता खोल दिया था। तब कांग्रेस के केदारनाथ से विधायक मनोज रावत ने इसका खुलकर विरोध किया था। 

समिति की रिपोर्ट पर पूर्व विधायक मनोज रावत का कहना है कि अब भी इसमें बहुत ज्यादा बदलाव की सिफारिश नहीं की गई है। इससे कोई भी कितनी भी जमीन खरीद सकता है। उन्होंने कहा कि बीते पांच साल में अधिनियम में बदलाव के बाद कितनी जमीनों की बंदरबांट हुई, क्या दुरुपयोग की गई भूमि को पुन: सरकार में शामिल किया जाएगा। इस पर समिति ने कोई सिफारिश नहीं की है।
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भू-कानून: सोशल मीडिया पर शुरू मुहिम मुकाम तक पहुंचती दिख रही  

बीते वर्ष मई-जून में सोशल मीडिया पर शुरू हुई प्रदेश में भू-कानून परिवर्तन की मांग अब मुकाम पर पहुंचते हुए दिख रही है। राज्य में भू-कानून के अध्ययन व परीक्षण के लिए गठित समिति ने सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपने के साथ ही तमात संस्तुतियां की हैं। बीते वर्ष इस मुद्दे को लेकर सबसे पहले सोशल मीडिया पर मुहिम शुरू हुई थी, जो धीरे-धीरे सड़क तक पहुंच गई। तमाम सामाजिक संगठनों के साथ ही राजनीतिक दलों ने भी इसे मुद्दा बना दिया। इसके बाद विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सरकार ने समिति का गठन कर इस मुद्दे पर उठते राजनीतिक और सामाजिक तूफान को रोकने का काम किया था। विस चुनाव में भी यह मुद्दों पर तौर पर राजनीतिक पार्टियों के बीच चर्चा का विषय बना रहा।

..तो गैर कृषि भूमि को फिर से कृषि भूमि में घोषित कर सकेंगे 

वर्तमान में गैर कृषि प्रयोजन के लिए खरीदी गई भूमि को 10 दिन में उपजिलाधिकारी धारा-143 के अंतर्गत गैर कृषि घोषित करते हुए खतौनी में दर्ज करते हैं। खरीदी गई भूमि का उपयोग निर्धारित प्रयोजन के लिए दो वर्ष के भीतर करना होता है। निर्धारित अवधि में उपयोग न करने, किसी अन्य उपयोग में लाने या भूमि को किसी अन्य को बेच देने पर राज्य सरकार में भूमि निहित करने का की शर्त है, लेकिन इस बीच प्रदेश में सिंगल विडो एक्ट लागू कर दिया गया। इसमें यदि 10 दिन में गैर कृषि प्रयोजन के लिए क्रय की गई कृषि भूमि को गैर कृषि भ्रूमि घोषित कर दिया जाता है, तो फिर यह धारा-167 के अंतर्गत राज्य सरकार में (उल्लंघन की स्थिति में) निहित नहीं की जा सकती है। समिति ने नई उपधारा जोड़ते हुए उक्त भूमि को पुन: कृषि भूमि घोषित करने और इसके बाद उसे राज्य सरकार में निहित करने की सिफारिश की है।

भू कानून रिपोर्ट अध्ययन के बाद, एक और वादा पूरा करेंगे धामी  

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने भू कानून अध्ययन और परीक्षण समिति की रिपोर्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंपना जनता से किया एक और वादा पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रदेश सरकार शीघ्र ही समिति के सुझावों का अध्ययन करेगी और राज्य की जनता के हित में भू कानून में आवश्यक सुधार लाएगी। उन्होंने कहा कि प्रदेश्रवासी यहां के हित में वर्तमान भू कानून में परिवर्तन की मांग कर रहे थे। इसके मद्देनजर जनहित में सीएम धामी ने अपने पिछले कार्यकाल में भू कानून के अध्ययन और परीक्षण के लिए उच्च स्तरीय समिति को यह जिम्मा सौंपा। भाजपा ने चुनाव के दौरान अपने दृष्टिपत्र में कमेटी से मिले सुझावों पर राज्यहित में भू कानून में जरूरी बदलावों का वादा किया था। इससे राज्य मे पलायन की समस्या पर भी अंकुश लगेगा और लोगों को संसाधनों का समुचित लाभ मिलेगा। 

लचर है भू कानून समिति की रिपोर्ट : सेमवाल 

उत्तराखंड क्रांति दल ने भू कानून समिति की रिपोर्ट को लचर करार दिया है। दल के केंद्रीय मीडिया प्रभारी शिवप्रसाद सेमवाल ने कहा कि भू कानून समिति ने मुख्यमंत्री को जो रिपोर्ट सौंपी है उसमें जमीनों को खुर्दबुर्द होने से बचाने के लिए कुछ नहीं है। यह रिपोर्ट मात्र उत्तराखंड की भूमि को नए तरीके से खरीदने और बेचे जाने के सुझावों का पुलिंदा है। इससे जमीनों की अवैध खरीद और तेज होगी। चाय बागान की हजारों बीघा जमीन खुर्दबुर्द की जा रही है, लेकिन इस भूमि के बारे में भू कानून समिति की रिपोर्ट में चुप्पी साध ली गई है। उक्रांद ने कहा कि 80 पेज की इस रिपोर्ट में जो सिफारिश की गई है, वह उत्तराखंड के आम जनमानस को निराश करने वाली है। दल प्रदेशभर में भू कानून समिति की रिपोर्ट की प्रतियां जलाएगा और मजबूत भू कानून लागू करने के लिए व्यापक आंदोलन चलाएगा।

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