उदक कुंड, इशानेश्वर महादेव मंदिर, सत्य नारायण मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, हंस कुंड, तप्तकुंड महाप्रलय से पहले यहां मौजूद थे। केदारनाथ से जुड़े तीर्थ पुरोहितों के मुताबिक आज भी लोग इनको खोजते हैं। इनकी नजर में इनको रिवाइव किए बिना केदारपूरी शायद ही पूरी मानी जाए।
पुराने मार्ग को बहाल करने की भी मांग
पुरोहित श्रीनिवास पोस्ती के मुताबिक रामबाड़ा से नदी के तट के साथ ही केदारनाथ का यात्रा मार्ग था। अब रामाबाड़ा में पुल बनाकर लिंचौली से यात्रा होती है। पुराने मार्ग को बहाल किए जाने की जरूरत है।
सात सालों में सबक भी कई लिए, धरातल पर काम अभी होना बाकी
केदारनाथ में आई महाप्रलय से कई सबक लिए लेकिन धरातल पर अभी पूरी तरह से काम होना बाकी है। केदारनाथ महाप्रलय में प्रदेश का वास्ता अचानक आने वाली बाढ़ से पड़ा था। इससे हुई तबाही के बाद प्रदेश में विश्व बैंक की सहायता से डिजास्टर रिकवरी प्रोजेक्ट भी शुरू किया गया। यह केदारनाथ की आपदा से लिया गया सबक है कि प्रदेश में इस समय दो डाप्लर रडार स्थापित किए जा रहे हैैं।
मौसम का आकलन करने के लिए 107 ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन, 25 सरफेस फील्ड ऑबजर्वेटरी, 16 स्नोगेज, 28 ऑटोमेटिक रेन गेज स्थापित किए गए हैं। प्रदेश में तहसील स्तर पर 180 सेटेलाइट फोन वितरित किए गए हैं। भूकंप के लिए सचेत तंत्र विकसित किया गया है। नदियों के किनारों में कई जगह रेट्रोफिटिंग की गई है।
कम्यूनिटी रेडियो का तंत्र स्थापित करने की तैयारी की गई है। इतना होने पर भी धरातल पर अभी काम दिखना बाकी है। रिवर मारफोलॉजिकल स्टडी को पूरा कर सिंचाई विभाग को सौंपा जा चुका है। इस स्टडी के आधार पर अब सिंचाई विभाग को काम करना है। 2013 केे बाद से ही नदी के बाढ़ क्षेत्र से लोगों को हटाने की तैयारी की गई थी। अब भी यह काम अधूरा है। डाप्लर रडार अभी स्थापित नहीं हो पाए हैं। इसी तरह से आपदा प्रबंधन तंत्र में सामुदायिक सहभागिता पर भी काम होना बाकी है।