बताया कि जब बेटा शहीद हुआ तो उस वक्त करीब 27 लाख रुपये मिले थे। इस पैसे से उन्होंने चांदमारी में मकान बना लिया था। इसके बाद 19 साल हो गए, सरकार से पांच हजार रुपये महीना पेंशन के अलावा कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ। नौकरी के इंतजार में छोटे बेटे अजय गुरुंग की उम्र ही निकल गई। अब वह एक प्राइवेट कंपनी में चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी है।
इसी तरह, सरकार ने आज तक जमीन नहीं दी है। दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते एड़ियां घिस गईं। उनका कहना है कि अब तो यह शौर्य दिवस केवल एक ढोंग लगता है, जिसमें सरकार हर साल औपचारिकता पूरी करती है। बेहतर हो कि सरकार ऐसे दिन सभी कारगिल शहीदों के परिवारों को बुलाए और उनकी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता से करे। यही उन वीर शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
शहीद के पिता श्याम सिंह गुरुंग
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कारगिल शहीद राजेश गुरुंग के परिवार को सरकार ने पांच बीघा जमीन देने की घोषणा की थी। पिता श्याम सिंह गुरुंग ने बताया कि गढ़ी कैंट में पांच बीघा जमीन चिह्नित भी की गई थी। उन्होंने बताया कि उन्हें पेट्रोल पंप भी देने की घोषणा की गई थी, लेकिन इसके लिए उन्होंने खुद मना कर दिया था। जमीन के लिए जब चक्कर काटे तो पटवारी ने जमीन की पैमाइश की। इसके बाद से आज तक बात आगे ही नहीं बढ़ पाई।
पेंशन के लिए भी काटने पड़ते हैं चक्कर
कारगिल शहीद परिवारों के लिए सिस्टम की सुस्ती और काहिली केवल घोषणाओं के पूरा होने में ही रुकावट नहीं है बल्कि पेंशन के भुगतान का सिस्टम भी बेहद सुस्त है। साल में कम से कम चार बार तो पटवारी से लेकर सैनिक कल्याण बोर्ड तक के चक्कर काटने पड़ते हैं। इसके बाद कहीं जाकर पेंशन मिलती है। कारगिल शहीद परिवारों की सरकार से मांग है कि जल्द से जल्द उनकी पेंशन भुगतान की प्रक्रिया सरल की जाए।