पाकिस्तान के इस ऑपरेशन का उद्देश्य हमारे राष्ट्रीय राजमार्ग 1डी श्रीनगर-लेह को वंचित करना ताकि भारतीय सेना सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र सियाचिन में रसद न पहुंचा सके और कश्मीर समस्या का समाधान पाकिस्तान की इच्छानुसार करने को मजबूर हो। इसके पीछे दो महत्वपूर्ण पहलू और भी थे पहला कश्मीर समस्या का अंतर राष्ट्रीयकरण और कश्मीर उग्रवादियों को प्रोत्साहित करना।
पाकिस्तान सेना ने जाड़ों के दिनों में खाली पड़ी भारतीय चौकियों में घुसपैठ शुरू कर दी, जिसे पाकिस्तान सेना के सबसे लड़ाकू और सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली स्पेशल सर्विस ग्रुप के साथ नार्दन लाइट इंफेंट्री की पल्टनें शामिल थी। यह इलाका काफी सर्दीला और बर्फ से ढका रहता था लिहाजा भारत की ओर से यहां पर जाड़ों में गश्त नहीं लगाई जाती थी। इसी वजह से घुसपैठ का पता नहीं चला। मई के दूसरे हफ्ते में एक चरवाहे की सूचना पर कैप्टन सौरव कालिया के नेतृत्व में पेट्रोलिंग यूनिट भेजी गई तो पाकिस्तान सेना के घुसपैठियों ने उन्हें मार दिया।
घुसपैठ का पता चलने पर अनुमान लगाया गया कि कुछ उग्रवादी हो सकते हैं। अत: कार्यवाही भी उसी अनुसार की गई। लेकिन भेजे गए दलों पर जब पाकिस्तान सेना ने जबरदस्त हमला किया तो पता चला कि ये उग्रवादी नहीं पाकिस्तानी सेना है। तब ऑपरेशन विजय नाम से कारगिल में भारतीय सेना ने मोर्चा खोला। इस युद्ध में हमारे केवल 30 हजार सैनिकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। पाकिस्तानी घुसपैठिये हमारी चौकियों में पूर्ण किलेबंदी करके सभी प्रकार के छोटे बड़े हथियारों से लैश थे।
उन्होंने बारूदी सुरंगें भी बिछाई थीं। 14 जून 1999 को भारतीय सेना के इतिहास में पहला दिन है जब प्वाइंट 4590 पर हमला करने में एक दिन की लड़ाई में हमारी सेना के सबसे अधिक जवान शहीद हुए। भारतीय सेना ने अपनी वीरता, पराक्रम, कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए करीब दो महीने चले युद्ध के बाद 26 जुलाई को सभी घुसपैठिये खदेड़ दिए। युद्ध विराम की घोषणा के साथ तब से 26 जुलाई कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है।