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CourageInKargil: हर कदम पर था मौत का खतरा, दुर्गम क्षेत्र में बुलंद हौसला बना भारतीय सेना का अहम हथियार

Sun, 26 Jul 2020 08:46 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हल्द्वानी

सार

  • मेजर बीएस रौतेला (अवकाश प्राप्त) ने बताई कारगिल युद्ध की पूरी कहानी
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मेजर बीएस रौतेला (अवकाश प्राप्त) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मेजर बीएस रौतेला (अवकाश प्राप्त) ने कारगिल युद्ध की पूरी कहानी बताई। उन्होंने बताया कि श्रीनगर से 205 किलोमीटर दूर एलओसी (युद्ध विराम रेखा) पर स्थित कारगिल इलाके में गर्मियों में भी तापमान काफी ठंडा रहता है। कारगिल युद्ध के दौरान इस क्षेत्र में कारगिल, द्रास और बटालिक क्षेत्र में मुख्य लड़ाई लड़ी गई थी जिसे भारतीय जवानों ने बुलंद हौसलों से जीता था। क्योंकि दुश्मन ऊंची पहाड़ियों पर बेहतर पोजिशन में था और भारतीय सैनिकों के लिए हर कदम पर मौत थी।

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कारगिल युद्ध से पहले फ्लैशबैक में चलते हैं। 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना ने कारगिल और आस-पास के सभी पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया था। 1965 में भारत-पकिस्तान युद्ध के बाद जब ताशकन्द समझौता हुआ तो कुछ चोटियां पाकिस्तान को दे दी गई, लेकिन 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में कर्नल चिवांग रिन्चिन के नेतृत्व में भारतीय सेना ने कारगिल में जबरदस्त युद्ध लड़ा और माइनस 17 डिग्री तापमान और 16 हजार फीट ऊंची चोटियों पर पाकिस्तान के कब्जे से सभी 15 चौकियों जीत ली। तब से कारगिल और आस-पास की चोटियां हमारे कब्जे में थी। 

1971 में दोनो देशों में समझौता हुआ कि युद्ध विराम रेखा का कोई उल्लंघन नहीं करेगा। लेकिन 71 की हार का जख्म पाकिस्तान भूला नहीं और फरवरी में 1999 में पाकिस्तानी सेना ने कारगिल की पहाड़ियों पर घुसपैठ करके मोर्चा, बंकर बना कर छद्म युद्ध की तैयारी कर ली। पाकिस्तान ने इस छद्म युद्ध का नाम ‘आपरेशन वद्र’ रखा था।

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मौका पाते ही भारतीय चौकियों में घुसपैठ शुरू कर दी थी

पाकिस्तान के इस ऑपरेशन का उद्देश्य हमारे राष्ट्रीय राजमार्ग 1डी श्रीनगर-लेह को वंचित करना ताकि भारतीय सेना सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र सियाचिन में रसद न पहुंचा सके और कश्मीर समस्या का समाधान पाकिस्तान की इच्छानुसार करने को मजबूर हो। इसके पीछे दो महत्वपूर्ण पहलू और भी थे पहला कश्मीर समस्या का अंतर राष्ट्रीयकरण और कश्मीर उग्रवादियों को प्रोत्साहित करना।

पाकिस्तान सेना ने जाड़ों के दिनों में खाली पड़ी भारतीय चौकियों में घुसपैठ शुरू कर दी, जिसे पाकिस्तान सेना के सबसे लड़ाकू और सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली स्पेशल सर्विस ग्रुप के साथ नार्दन लाइट इंफेंट्री की पल्टनें शामिल थी। यह इलाका काफी सर्दीला और बर्फ से ढका रहता था लिहाजा भारत की ओर से यहां पर जाड़ों में गश्त नहीं लगाई जाती थी। इसी वजह से घुसपैठ का पता नहीं चला। मई के दूसरे हफ्ते में एक चरवाहे की सूचना पर कैप्टन सौरव कालिया के नेतृत्व में पेट्रोलिंग यूनिट भेजी गई तो पाकिस्तान सेना के घुसपैठियों ने उन्हें मार दिया।

घुसपैठ का पता चलने पर अनुमान लगाया गया कि कुछ उग्रवादी हो सकते हैं। अत: कार्यवाही भी उसी अनुसार की गई। लेकिन भेजे गए दलों पर जब पाकिस्तान सेना ने जबरदस्त हमला किया तो पता चला कि ये उग्रवादी नहीं पाकिस्तानी सेना है। तब ऑपरेशन विजय नाम से कारगिल में भारतीय सेना ने मोर्चा खोला। इस युद्ध में हमारे केवल 30 हजार सैनिकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। पाकिस्तानी घुसपैठिये हमारी चौकियों में पूर्ण किलेबंदी करके सभी प्रकार के छोटे बड़े हथियारों से लैश थे।

उन्होंने बारूदी सुरंगें भी बिछाई थीं। 14 जून 1999 को भारतीय सेना के इतिहास में पहला दिन है जब प्वाइंट 4590 पर हमला करने में एक दिन की लड़ाई में हमारी सेना के सबसे अधिक जवान शहीद हुए। भारतीय सेना ने अपनी वीरता, पराक्रम, कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए करीब दो महीने चले युद्ध के बाद 26 जुलाई को सभी घुसपैठिये खदेड़ दिए। युद्ध विराम की घोषणा के साथ तब से 26 जुलाई कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
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