भोजन तैयार होने तक भक्ति गीतों पर झूमना, साथियों के साथ हंसी-मजाक करना और फिर प्रसाद की तरह मिल-बांटकर भोजन करना, यह दृश्य हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रहा था। सोनीपत से आए शिवभक्त रामशरण ने बताया कि वह करीब 40 साथियों के जत्थे के साथ तीसरी बार कांवड़ यात्रा पर निकले हैं।
उनका कहना है कि अपने हाथों से बनाया गया भोजन खाने का अलग ही आनंद है। वहीं फरीदाबाद से पहुंचे 20 लोगों के जत्थे में शामिल गुरुशरण का कहना था कि इससे शुद्ध भोजन मिलता है और बाहर के खाने पर निर्भरता भी नहीं रहती। जब भी भूख लगे अपनी सुविधा के अनुसार परिवार की तरह बैठकर खाने से उसमें भक्ति का स्वाद भी मिल जाता है।