पानी जमीन में समा रहा
पहले जनसंख्या कम थी। इसलिए इसका असर नहीं दिख रहा था। क्षेत्रों में पानी की निकासी की भी समुचित व्यवस्था नहीं है। ऐसे में पानी जमीन में समा रहा है। विवि के भूगोल विभाग के प्रो. मोहन पंवार कहते हैं कि बेतरतीब ढंग से बस रहे शहरों और कस्बों मेंं निर्माण नीति की अनदेखी हो रही है। मलबे के ढेर के ऊपर कंक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं।
लिहाजा हल्की सी हलचल भू-धंसाव और भूस्खलन के रूप में सामने आ रही है। लगभग 45 प्रतिशत बस्ती अचानक तेजी से बसी है। इनकी बसावट का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इन स्थानों पर जमीन के ऊपर अचानक दबाव आ गया है। यह नहीं देखा जा रहा है कि जहां निर्माण कार्य हो रहा है, वहां की भू आकृति सुरक्षित है कि नहीं।
-हिमालय में विकास कार्य के लिए उचित ढंग से प्लानिंग होनी चाहिए। ऐसी भवन नीति बननी चाहिए कि भारी सीमेंट-कंक्रीट-सरिया के भवन कम बने। ज्यादा ऊंचे भवन न बने।
-प्रो. यशपाल सुंद्रियाल, भूविज्ञानी गढ़वाल विवि श्रीनगर।
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हर जगह की अपनी धारण क्षमता होती है। यानि कि जमीन कितना दबाव सह सकती है। यदि धारण क्षमता से अधिक दबाव पड़ेगा तो आपदा आनी तय है। जिन स्थानों में एक से दो मंजिला भवन बनने चाहिए थे वहां पांच से छह मंजिला भवन बन गए। बिना धारण क्षमता के आकलन के बस्तियों में बसावट पर रोक लगनी चाहिए।
-प्रो. मोहन पंवार, भूविज्ञानी, गढ़वाल विवि श्रीनगर