कालसी के मुंशी गांव में मरोज पर्व पर सामूहिक आंगन में हारूल नृत्य करते ग्रामीण।
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समूचा जौनसार बावर रविवार को पूरी तरह से मरोज पर्व के रंग में रंगा नजर आया। देर शाम तक गांवों में गीत संगीत की यार बहती रही। लोग हारुल और तांदी नृत्य पर झूमते रहे।
क्षेत्र में मरोज पर्व को लेकर जबरदस्त उत्साह है। खानपान के साथ ही मनोरंजन के भी विशेष प्रबंध किए गए हैं। खत सिलगांव, पसगांव, बमठाड़, सिली, उपल गांव, कोरू, उरटाड़, बाना, लखवाड़ समेत पूरे जौनसार बावर में पर्व की शुरुआत हो गई। लोगों ने एक-दूसरे के घर जाकर बधाई दी और व्यंजनों का लुत्फ उठाया। इससे पहले लोगों ने परंपरा के अनुसार मंदिरों में जाकर देव आराधना की। रात्रि भोज के बाद ढोलक, खंजरी की थाप पर लोगों ने जमकर नृत्य किया गया। देर रात तक जश्न चलता रहा। पर्व की शुरुआत होने के बाद अब पूरे एक माह तक पूरे क्षेत्र में माघ पर्व का उल्लास छाया रहेगा। घर-घर में दावतों का दौर चलेगा। पर्व के आठवें दिन गांव में खोड़ा पर्व मनाया जाता है। जिसके बाद नौवें दिन साजे और 11वें दिन सुड़ियात पर्व मनाया जाता है।
चोट प्रथा का महत्व
पर्व पर कोई भी परिवार अपने द्वारा पाला गया बकरा स्वयं नहीं काटता। उसे दूसरे परिवार के सदस्य से कटवाया जाता है। जिसे स्थानीय भाषा में चोट कहते हैं।
यहां नहीं कटता बकरा
विकासनगर। पूरे जौनसार बावर में जहां मरोज पर्व के दौरान बकरे काटने की परंपरा है, वहीं देवघार रेंज के मेघाटू और भगात गांव में बकरे नहीं काटे जाते। 24 साल पूर्व गांव ने पंचायत कर पर्व पर बकरे न काटने का फैसला लिया था। बताया जाता है कि गांव ने यह फैसला लोगों की आर्थिक स्थिति को देखकर लिया। पंचायत के फैसले के बाद गांव में यह परंपरा बंद कर दी गई है, जो व्यक्ति बकरा काटते हुए पकड़ा जाता है, पंचायत उससे पांच हजार रुपये का आर्थिक दंड वसूल सकती है।