मियावाकी तकनीक की शुरुआत करने से पहले वन कर्मियों को बाकायदा प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें तकनीक के बारे में जानकारी देने के साथ फील्ड विजिट कराया गया। इसके बाद उत्तराखंड में प्रयोग शुरू हुआ है।
क्या है मियावाकी तकनीक
वन क्षेत्राधिकारी मदन बिष्ट बताते हैं कि जापान में अकीरा मियावाकी ने अस्सी के दशक में इसकी शुरुआत की थी। इसमें तीन स्तर पर काम होता है। पहले स्थानीय प्रजातियों की पहचान और फिर नर्सरी में पौधों को तैयार करना, मिट्टी की सेहत सुधारने के बाद एक खास पदार्थ में डुबो कर शर्ब (झाड़ी प्रजाति), हर्ब (शाकीय) और पेड़ तीनों प्रजातियों के पौधों को समूह में लगाया जाता है।
ये पौधे बहुत करीब लगते हैं। इस प्रयोग से जंगल तेजी से तैयार हुआ। बाद में इसे अन्य जगहों पर भी अपनाया। गया। इसी तकनीक से पीपलपड़ाव में पौधों का रोपण किया गया। इन पौधों की ग्रोथ सामान्य तौर पर तैयार होने वाले पौधों की तुलना में दो गुना ज्यादा है।