उत्तराखंड के जिले में स्थित प्रसिद्ध जागेश्वर धाम उत्तर भारत में प्रमुख शिव मंदिरों में एक है।
जागेश्वर से ही शुरू हुआ शिव लिंग का पूजन
पौराणिक मान्यता है कि यहां शिव जागृत रूप में विद्यमान हैं और सबसे पहले शिव लिंग का पूजन जागेश्वर से ही शुरू हुआ।
सावन माह में यहां जलाभिषेक, पार्थिव पूजन, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय पूजन का खास महत्व माना जाता है। उत्तराखंड समेत देश के अन्य भागों से काफी संख्या में श्रद्धालु जागेश्वर धाम पहुंचते हैं।
अल्मोड़ा से 38 किमी दूर पिथौरागढ़ मार्ग में आरतोला के निकट जागेश्वर धाम देवदार के घने जंगल के बीच स्थित है। जागेश्वर धाम को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।
जागेश्वर धाम परिसर में 124 मंदिरों का समूह है। इन मंदिरों का निर्माण सातवीं से चौदहवीं शताब्दी के मध्य हुआ है। यहां जागनाथ, महामृत्युंजय, पुष्टिमाता, नवदुर्गा, बद्रीनाथ, केदारनाथ, नीलकंठ, कुबेर भगवान आदि के मंदिर हैं।
कूर्म पुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण, शिव पुराण आदि धार्मिक ग्रंथों में जागेश्वर के महत्व को बताया गया है। यहां स्थित महामृत्युंजय मंदिर में विशेष रूप से रोग, शोक, भय, अकालमृत्यु, काल सर्प दोष निवारण के लिए अनुष्ठान किए जाते हैं।
सभी मनोकामना होती हैं पूरी
संतान प्राप्ति के लिए महिलाएं सावन चतुर्दशी की रात्रि में महामृत्युंजय मंदिर में हाथ में दीपक लेकर तपस्या करती हैं तो उनकी मनोकामना पूरी होती है।
जागेश्वर में सावन माह में पार्थिव पूजन का विशेष महत्व है। श्रद्धालु मनोकामना के लिए मिट्टी, चावल के आटे, मक्खन, गोबर आदि के शिवलिंग बनाकर पूजा अर्चना करते हैं।