पिछले चार दशक से यूपी से लेकर उत्तराखंड की राजनीति में बड़े नेताओं में शुमार रही कैबिनेट मंत्री डॉ. इंदिरा हृदयेश वैसे तो सीएम बनाए जाने को लेकर कई बार चर्चाओं में आयी लेकिन राज्य के गठन के डेढ़ दशक बाद भी सीएम के सत्ता का सुख उन्हें नही नसीब हो पाया है।
कांग्रेस पार्टी के लिए पूरा राजनीतिक जीवन समर्पित करने वाली डॉ. हृदयेश के मुख्यमंत्री न बन पाने का मलाल उनकी बातों और चेहरे पर साफ झलकता है। लेकिन सीएम की कुर्सी न मिल पाने के सवाल पर बचाव करते हुए कहती है ‘पार्टी की समर्पित कार्यकर्ता हूं, जीवनपर्यंत समर्पित रहूंगी। आलाकमान के निर्देशों का पालन करती हूं।’
डॉ. हृदयेश बड़े ही साफगोई से कती है कि आगामी विधानसभा चुनाव में परिवादवाद को दरकिनार करते हुए एक परिवार से एक ही व्यक्ति को टिकट दिया जाना चाहिए। पेश है डॉ. इंदिरा हृदयेश और अमर उजाला संवाददाता अरविंद सिंह के बीच राजनीतिक मुद्दों पर बातचीत के कुछ अंश।
सवाल - आपको पूर्व मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी का उत्तराधिकारी माना जाता था। फिर मुख्यमंत्री हरीश रावत और पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा जैसे नेताओं को आपके ऊपर तवज्जो कैसे मिली?
जबाब- देखिए, सभी राजनीतिक दलों की अपनी एक परंपरा होती है। बहुत सारे समीकरणों को ध्यान में रखते हुए आलाकमान कोई निर्णय लेता है। जहां मुख्यमंत्री हरीश रावत के सीएम बनने का प्रश्न है तो उनके लंबे राजनीतिक, संसदीय अनुभवों के नाते कुर्सी दी गई। जबकि पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को ‘पॉलिटिकल हेरिटेज’ यानी अपने पिता स्वर्गीय एचएन बहुगुणा का पुत्र होने का लाभ मिला। जहां तक मेरा सवाल है तो मै सीएम पद को लेकर राज्य गठन के साथ ही चर्चाओं में कई बार रही। लेकिन कभी दावेदारी नही की। अब यह आलाकमान का अंतिम निर्णय है कि वह किसको क्या देता है।
सवाल - पिछले दिनों सियासी संकट के दौरान आपको सीएम बनाए जाने की चर्चाएं रही। आपने दिल्ली दरबार में जाने की चर्चाएं रही? ये महज राजनीतिक कयास हैँ या फिर कुछ सच्चाई भी है?
जवाब - किसी भी राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का दौर आता है तो पार्टी आलाकमान तमाम वरिष्ठ नेताओं के साथ मंथन करता है। सियासी संकट के दौरान पूर्व मंत्री समेत 10 पार्टी विधायक एक साथ पार्टी का दामन छोड़कर चले गए। परिणामस्वरूप गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा हो गया। इसी बीच सीएम का स्टिंग आपरेशन प्रकरण हो गया। तमाम मुद्दों को लेकर आलाकमान ने चर्चा के लिए दिल्ली बुलाया था। कहा न कि सीएम के लिए हमेशा से चर्चाएं होती रही हैं।
सवाल -सीएम बनने की आपकी बहुप्रतीक्षित इच्छा है। राजनीतिक अनुभवों को देखते हुए आप उसकी हकदार भी हैं। अब आप सीएम बनने की चाहत में क्या राजनीतिक कदम उठाने जा रही है?
जवाब- देखिए अभी सबसे पहले हमारा टारगेट आगामी विधानसभा चुनाव में 40 का आंकड़ा पार कर सत्ता में आना है। उसके बाद तमाम चीजें देखी जाएगी। जहां तक सीएम बनने को लेकर किसी भी प्रकार की राजनीतिक योजना का सवाल है तो ऐसी कोई योजना नही है। ‘नेचुरल च्वाइस’ में यदि आलाकमान कुछ कहता है तो अवसर आने पर देखा जाएगा।
सवाल - पिछले कई माह पूर्व सीएम साहब और आपके बीच तमाम मुद्दों को लेकर वैचारिक मतभेद हो गए थे। सीएम साहब ने ऐसा कौन सा राजनीतिक चारा डाला कि सब कुछ सामान्य हो गया?
जवाब - देखिए एक अच्छे राजनेता का गुण है कि वह वैचारिक मतभेदों को मुद्दा नही बनाए। कांग्रेस पार्टी की एक समर्पित कार्यकर्ता होने के नाते मेरी नैतिक जिम्मेदारी बनती थी कि मै सियासी संकट के दौरान न सिर्फ पार्टी वरन सीएम का पूरा साथ दूं। चार दशकों से राजनीति कर रही हूं। आखिरकार बच्चों की तरह किसी बात को लेकर रूठ भी तो नही सकती।
सवाल - ऐसी चर्चाएं है कि आप सीएम की कुर्सी पाने के लिए तंत्र विद्या और ज्योतिषियों का सहारा ले रही हैं ? यह कहां तक सच है?
जवाब- (मुस्कराते हुए) देखिए भइया, हमें ज्योतिषियों और तंत्र विद्या में कोई विश्वास नही है। भविष्यवाणियों में मेरा कोई यकीन नही है। डॉ. इंदिरा हृदयेश अपने आप पर विश्वास करती हैं। सीएम बनना न बनना सब कुछ राजनीतिक समीकरण तय करते हैं।
सवाल - बेटे की राजनीति को लेकर आप पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का भी आरोप लग रहा है। क्या कहना चाहेंगी?
जवाब - मेरे तीन बेटे है। दो बड़े बेटे व्यापार करते हैं जबकि तीसरे की राजनीति में दिलचस्पी है। उसकी राजनीतिक सूझबूझ को देखते हुए कांग्रेस ही नहीं सभी राजनीतिक दलों की युवा पीढ़ी उसके साथ है। चुनाव में मेरी पूरी मदद करता है। साफतौर पर कह दूं कि पुत्र होने के नाते मेरा राजनीतिक उत्तराधिकारी भी है। जहां तक परिवारवाद का सवाल है तो मैने कभी परिवारवाद को बढ़ावा नही दिया। अगला चुनाव मेरा बेटा नही वरन मैं लड़ूंगी। मै तो कहती है कि केंद्रीय आलाकमान को एक परिवार के एक व्यक्ति को टिकट देना चाहिए। परिवारवाद का मसला ही समाप्त हो जाएगा।
सवाल - सरकार, संगठन के बीच तमाम मुद्दों को लेकर मतभेद की स्थिति है। सीएम साहब और प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय एक दूसरे को लेकर मीडिया में बयान जारी करते रहते हैं। ऐसा नही लगता है कि इस मतभेद का खामियाजा पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।
जवाब- देखिए सीएम साहब और प्रदेश अध्यक्ष एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों अभिन्न साथी रहे हैं। एक दूसरे के पूरक रहे हैं। ऐसे में मतभेद की कोई गुंजाइश ही नही बनती है। जहां तक सरकार और संगठन के बीच मतभेदों का सवाल है तो कोई गंभीर मतभेद नही हैं। आपस में मिल बैठकर तमाम मुद्दों को सुलझा लिया जाएगा।
सवाल - आप पिछले कई माह से मुख्यमंत्री हरीश रावत और सरकार के लिए संकटमोचक की भूमिका निभा रही हैं। क्या केंद्रीय आलाकमान से इसका कोई इनाम मिलने की भी उम्मीद रखती हैं?
जवाब- सियासी संकट के दौरान सीएम और सरकार के साथ मजबूती से खड़ा होना हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती थी। आगामी कुछ महीनों में यूपी, उत्तराखंड समेत कई राज्यों में चुनाव है। ऐसे में पहली प्राथमिकता पार्र्टी को बहुमत से जिताना है। उसके बाद ही किसी भी प्रकार इनाम की अपेक्षा की जा सकती है।
सवाल - केंद्र ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू कर दी है। ऐसे में देर सबेर राज्य सरकार को भी इसे लागू कराने को लेकर भारी दबाव होगा। लेकिन राज्य की वित्तीय स्थिति इतनी मजबूत नही है कि इसे लागू कराया जा सके। बतौर वित्त मंत्री आप क्या कहना चाहेगी?
जवाब - देखिए वेतन आयोग की रिपोर्ट सभी राज्यों को लागू करना है। हमारी सरकार को भी इसे लागू कराना है। यथासमय सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू की जाएगी। इसके लिए सरकार की ओर से बजट का प्रबंध किया जाएगा।
Published By : Nirmala Suyal