‘66 साल बीत गए, लेकिन आज भी वह फिल्म लेखिका कामना चंद्रा को आजादी का दिन अच्छी तरह याद है। 14 अगस्त 1947 की रात रेडियो पर पं. जवाहरलाल नेहरू का भाषण सुना।
रेडियो पर ही आजादी का ऐलान हुआ तो एमकेपी कालेज के हास्टल में रहने वाली मैं और मेरी सहपाठी छात्राएं झूम उठीं। खुशी इतनी थी कि रातभर घंटियां बजाकर, देशभक्ति गीत गाते रहे। अगली सुबह सूरज की किरण बेहद खास लगीं, 15 अगस्त के उस दिन हम आजाद जो हुए थे।’
कुछ इन शब्दों में प्रख्यात फिल्म लेखिका कामना चंद्रा ने अमर उजाला से आजादी का अपना अनुभव बांटा। बताया कि अगली सुबह छात्राओं ने कालेज में जमकर जश्न मनाया।
दून के एमकेपी से खास जुडाव
प्रेमरोग, चांदनी, करीब, भैरवी और 1942 ए लव स्टोरी जैसी फिल्में लिख चुकी कामना ने बताया कि उनकी पढ़ाई एमकेपी कालेज से हुई। मूलत: मुजफ्फरनगर की रहने वाली कामना ने बताया कि उनकी पढ़ाई के लिए मां ने घर की जमीन बेच डाली थी। बताया कि दून से उन्हें खास लगाव है। 1948 में राजकपूर की पहली फिल्म आग उन्होंने यहां के प्रभात सिनेमा में देखी। अपनी पहली फिल्म ‘प्रेमरोग’ उन्होंने राजकपूर के लिए ही लिखी थी। दून निवासी मनोज पंजानी बताते हैं कि वह जब भी कामना से मिलने मुंबई गए, दून का होने के नाते वह बिना इंतजार कराए मिलीं।
नाटकों से फिल्मों की ओर
कामना ने रेडियो के लिए कई नाटक लिखे। कामना के मुताबिक जब उन्होंने महसूस किया कि हिंदी फिल्मों में अच्छी कहानियों का अभाव है, तो वह राजकपूर के पास पहुंची। इसके बाद राजकपूर ने उनकी लिखी कहानी पर प्रेमरोग बनाई। यश चोपड़ा ने उनकी कहानी पर चांदनी बनाई, जो 50 हफ्ते तक सिनेमा हाल में चली। दून के प्रभात में भी यह फिल्म 25 हफ्ते तक लगी रही। कामना की बेटी तनुजा चंद्रा ने जख्म, तमन्ना, दिल तो पागल है आदि फिल्मों की कहानियां लिखी हैं।
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