छह सालों में वे करीब 1500 प्रवासियों को उनके घर भेजने में मदद कर चुके हैं। उन्होंने मदद के बदले आज तक किसी भी व्यक्ति से पैसा नहीं लिया है। कोरोना काल में फंसे ढाई सौ लोगों की आबूधाबी में मंदिर निर्माण में लोगों और काउस्लेट के साथ मिलकर रहने, खाने की व्यवस्था की है और उनको घर भेजने की व्यवस्था कराई थी।
खून में है सेवाभाव, गांव से लगाव
गिरीश कहते हैं कि उनके दादा स्व. लक्ष्मी दत्त पंत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनके पिता नंदा बल्लभ पंत सरस्वती शिशु मंदिर में आचार्य रह चुके हैं और दिल्ली में सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं। उनके खून में सेवाभाव है। पहाड़ से बेहद लगाव रखने वाले गिरीश हर साल अपने गांव जरूर जाते हैं।
कई सम्मान से नवाजे गए हैं गिरीश
गिरीश पंत को प्रवासियों के लिए बेहतर कार्य के लिए कईं देशों से सम्मान मिल चुका है। श्रीलंका के राष्ट्रपति के हाथों वर्ल्ड आइकॉन पुरस्कार मिल चुका है जबकि यूएसए सरकार की ओर से इंटरनेशनल यूथ लीडर अवॉर्ड दिया जा चुका है। गिरीश का कहना है कि उनकी उम्र 41 साल है। उत्तराखंड और दिल्ली के वे पहले व्यक्ति हैं, जिन्हें सबसे कम उम्र में उन्हें राष्ट्रपति के हाथों प्रवासी भारतीय अवॉर्ड मिला है। कोरोना कॉल में उन्होंने यूएई में 300 से ज्यादा लोगों का दाह संस्कार कराया है।