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अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस: अपनों ने दूर किया तो जिंदादिली बनी सहारा

Mon, 01 Oct 2018 01:29 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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प्रतीकात्मक फोटो
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जीवनभर जिन्हें पैरों पर खड़ा करने के लिए मेहनत की अब वे ही भूल गए।

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उम्र के जिस पड़ाव में अपनों की जरूरत होती है, उसमें वे एकाकी जीवन जीने को मजबूर हैं। कोई अपनी जवानी के दिन याद करता है तो कोई अपनी कामयाबी को। अब बस यही यादें हैं जो उनके जीने का सहारा बनी हैं।

किसी ने अपनी जवानी देश की सेवा में गुजारी तो किसी ने प्रेम को ही जीवन समझा। ये कहानी है उन बुजुर्गों की, जिनका भरा पूरा परिवार होते हुए भी वृद्धाश्रम ही जीवन का आखिरी पड़ाव बन चुका है। आज हम कुछ ऐसे ही बुजुर्गों से रूबरू करा रहे हैं, जिन्होंने जीवन में कई मुकाम हासिल किए।

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जिंदादिल ‘चांदी के बाल वाली बुढ़िया’

बख्तियार रावत - फोटो : amar ujala
उम्र 82 की और दिल 20 का। कभी वेहल्म जैसे स्कूल में शिक्षिका रहीं बख्तिवार रावत भी यहीं प्रेमधाम में रह रही हैं। उनकी बातों से जरा भी नहीं लगता कि वो अकेली रह रहीं हैं और उनका अपना कोई उनके पास नहीं आता। वह देश-विदेश की आठ भाषाएं जानती हैं।

अंग्रेजी साहित्य की बात हो या फिल्मी दुनिया की, वे बहुत कुछ जानती हैं। उनके पति भी स्कूल में टीचर थे। वह जवान जैसे ठहाके लगाती हैं। एक पल भी एहसास नहीं कि वो अब उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं। कहती हैं कि मैंने हमेशा इस दुनिया को उल्टा ही देखा है, जहां जो लोगों को सही लगता था मुझे गलत लगता है। नाम पूछने पर कहती हैं कि उन्हें सिर्फ चांदी के बाल वाली बुढ़िया बोला जाए।

बैंक बैलेंस ही तो नहीं है बाकी सब ठीक है
74 साल के विजय शर्मा जिंदादिल व्यक्ति हैं। वृद्धाश्रम में रहने के लिए वे कुछ अपनी तो कुछ अपने परिवार की गलती बताते हैं। शर्मा बताते हैं कि वे मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव थे। प्रेम में बेहद विश्वास था। जीवनसाथी भी अच्छा मिला, जिनसे प्रेम विवाह किया। कहते हैं कि जैसे-जैसे बच्चे सेटल होते गए, मैं अपनी जिम्मेदारी भूलता गया। एक दिन काफी शराब पी ली तो परिवार वालों ने नशामुक्ति केंद्र भेज दिया। इस बीच पत्नी बच्चों को लेकर मायके चली गई।

15 महीने नशामुक्ति केंद्र में रहने के बाद जब घर गए तो बच्चों और पत्नी ने उन्हें वृद्धाश्रम में रहने की सलाह दी और यहां प्रेमधाम में भर्ती करा दिया। शर्मा बताते हैं कि मेरी पत्नी मेरा प्रेम है, मेरा जीवन है। पत्नी सीएनआई से रिटायर लेक्चरार हैं। आज भी वह अपनी पेंशन से यहां छह हजार रुपये महीना भेजती हैं। शिकायत सिर्फ बच्चों और उनके बच्चों से है, जो यहां से ले जाने की बात तो दूर, बात तक नहीं करते। अब इस आश्रम के कामों में ही खुद को व्यस्त रखता हूं। कहते हैं कि अब ये ही मेरा परिवार है।
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इस ‘शेर’ से कभी दुश्मन भी थर्राते थे 

देहरादून में जन्में बीएस नेगी ने 1955 में वायुसेना ज्वाइन की थी। इसके बाद उन्होंने विभागीय परीक्षा पास की और साल 1964 में वे आर्मी में बतौर सेकेंड लेफ्टिनेंट भर्ती हो गए। उन्होंने 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में वीरता दिखाई। गोरखा रेजीमेंट में रहते हुए उन्होंने साल 1971 के भारत पाक युद्ध में लंगड़ा पोस्ट पर भी कब्जा किया।

दुश्मनों की गोलियों के बीच करीब 15 दिन इस पोस्ट पर गुजारने के बाद बीएस नेगी सकुशल लौटे। नेगी बताते हैं कि उनकी आवाज में वो दम था कि साथी कर्मचारी भी उन्हें शेर कहकर पुकारते थे। 1987 में वे कर्नल पद से रिटायर हुए और परिवार के साथ देहरादून में रहने लगे। वे बताते हैं कि 90 के दशक में बेटा और बेटी की पढ़ाई भी पूरी हो गई। बेटा अमेरिका में सेटल हो गया और बेटी नोएडा में। पत्नी की मौत 1974 में ही हो चुकी थी।

ऐसे में घर में कोई देखभाल के लिए नहीं था तो बेटी ने ही सात साल पहले उन्हें प्रेमधाम आश्रम में भर्ती करा दिया। बेटे की बेरुखी से आहत कर्नल नेगी कहते हैं कि जिस दिन से वे यहां आए हैं तब से उनका बेटा उनसे नहीं मिला। कभी कभार संडे को फोन कर लेता है। नेगी कहते हैं कि सिर्फ इतने भर से मैं कैसे अपने परिवार को भूल जाऊं, वो तो बेटी का सहारा है जो यहां रुपये भिजवा देती है।
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