अपनी बोली को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के नहीं हुए ठोस प्रयास
देश के कई विवि में गढ़वाली, कुमाऊंनी भाषा एवं साहित्य पर कई पीएचडी शोध ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। वर्ष 1913 में गढ़वाली भाषा का प्रथम समाचार पत्र गढ़वाली समाचार प्रकाशित हुआ। इसके अलावा भी इसकी कई साहित्यिक पृष्ठभूमि है।,लेकिन राज्य गठन के 24 साल बाद भी अपनी बोली-भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं हुए।
अस्थायी कर्मचारियों के भरोसे चल रहा संस्थान
उत्तराखंड भाषा संस्थान के तहत गठित हिंदी, उर्दू, पंजाबी एवं लोक भाषा एवं बोली अकादमियों का उद्देश्य हिंदी, उर्दू, पंजाबी एवं लोक भाषा और बोलियों का विकास करना है, लेकिन संस्थान शुरुआत से ही अस्थायी कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है।
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गैरसैंण में भाषा संस्थान के मुख्यालय की मुख्यमंत्री की घोषणा है, लेकिन इसके लिए संस्थान के एक्ट में बदलाव नहीं हुआ। एक्ट में संस्थान का मुख्यालय अब भी देहरादून में है। इसके लिए सहस्त्रधारा रोड में जमीन का चयन कर लिया गया है। हालांकि, अभी भूमि हमें हस्तांतरित नहीं हुई। -स्वाति भदौरिया, निदेशक भाषा संस्थान