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चुनाव से पहले EVM के बारे में जानें सबकुछ

Fri, 02 May 2014 11:38 AM IST
अमर उजाला, हल्द्वानी
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लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्पक्ष और पारदर्शी मतदान करने के लिए इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) सबसे सुरक्षित विकल्प है।
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ईवीएम एक इलेक्ट्रानिक उपकरण है, इसकी जितनी खूबियां हैं, कुछ तकनीकी कमजोरियां भी हैं। एक ईवीएम से अधिकतम 63 प्रत्याशियों के लिए मतदान कराया जा सकता है।

यानि किसी सीट पर 64 प्रत्याशी मैदान में होते हैं तो फिर वहां बैलेट पेपर से ही मतदान कराया जाता है।

सात मई को नैनीताल-ऊधमसिंह नगर संसदीय सीट पर 2122 बूथों पर 2122 ईवीएम मतदान के लिए इस्तेमाल होंगी, जबकि 555 ईवीएम को रिजर्व में रखा जाएगा।
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यहां बनती हैं ईवीएम

इलेक्ट्रानिक कारपोरेशन ऑफ इंडिया और भारत इलेक्ट्रानिक लिमिटेड ही ईवीएम बनाने के लिए अधिकृत हैं। भारत में इन्हीं कंपनियों की ईवीएम से मतदान कराया जाता है।

भारत इलेक्ट्रानिक लिमिटेड की यूनिट उत्तराखंड स्थित कोटद्वार में भी है, जहां मशीनें तैयार होती है। दोनों ही कंपनियां पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका समेत दुनिया के 64 देशों को ईवीएम की सप्लाई देती हैं।

वहां भी इन्हीं ईवीएम से मतदान कराया जाता है।

भारत में सबसे पहले कब इस्तेमाल हुई ईवीएम
ईवीएम का भारत में पहली बार 1981 के चुनाव में इस्तेमाल हुआ था। शुरुआत में केरला के 50 बूथों पर बतौर ट्रायल ईवीएम से मतदान कराया गया।

केरल का ट्रायल सफल होने के बाद धीरे-धीरे बाकी राज्यों में चुनाव में इसका इस्तेमाल होने लगा। 2004 में भारत में 100 फीसदी मतदान ईवीएम से होने लगा।

3864 वोट के बाद बंद हो जाती है ईवीएम

ईवीएम की कंट्रोल यूनिट अहम है। एक कंट्रोल यूनिट में अधिकतम 3864 वोट डाले जा सकते हैं, इसके बाद उसमें वोट नहीं पड़ते हैं।

यही वजह है कि किसी बूथ पर 1200 से अधिक वोट होते हैं तो निर्वाचन आयोग के निर्देशन पर दूसरा मतदान बूथ बनाया जाता है।

एक कंट्रोल यूनिट से ऑपरेट हो सकती हैं चार बैलेट यूनिट
बैलेट यूनिट पर अधिकतम 16 बटन होते हैं। किसी सीट पर 15 से अधिक प्रत्याशी होते हैं तो दूसरी बैलेट यूनिट जोड़ी जाती है। 16वां बटन नोटा का है। एक कंट्रोल यूनिट से अधिकतम 4 बैलेट यूनिटों को जोड़ा जा सकता है।

22 घंटे है ईवीएम का बैटरी बैकअप
कंट्रोल यूनिट में 7.5 वोल्ट और 2 एएच की बैटरी लगती है। इसी बैटरी से कंट्रोल यूनिट और बैलेट यूनिट को आपस में कनेक्ट किया जाता है।

बैटरी का अधिकतम बैकअप 22 घंटे है। हर चुनाव के बाद कंट्रोल यूनिट में नई बैटरी लगाई जाती है।

ऑन होते ही आती है समय और तारीख

कंट्रोल यूनिट के ऑन होते ही उसमें तारीख और समय के साथ बैटरी का स्टेटस डिस्पले होता है।

बैटरी दर्शाती है कि उसकी क्या स्थिति है और कितने घंटे तक उससे काम लिया जा सकता है। इसके बाद कंट्रोल यूनिट के डिस्पले में उसमें फीड किए प्रत्याशियों की संख्या आती है।

ऐसे काम करती है मशीन
कंट्रोल यूनिट से पीठासीन अधिकारी के बैलेट जारी करने का बटन दबाते ही कंट्रोल यूनिट में लाल और बैलेट यूनिट में हरी बत्ती जल जाती है।

इसका मतलब होता है कि मशीन वोट डालने के लिए तैयार है। मतदाता के वोट डालते ही बीप की आवाज के साथ कंट्रोल यूनिट की लाल और बैलेट यूनिट की हरी बत्ती बंद हो जाती है।
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सील होने के बाद छेड़छाड़ संभव नहीं

कंट्रोल यूनिट में सुरक्षा के कई मानक हैं। मतदान बूथों तक पहुंचने से पहले कंट्रोल यूनिट को एजेंट, पोलिंग और पीठासीन अधिकारियों की मौजूदगी में सील किया जाता है। उस वक्त इनके हस्ताक्षर होते हैं।

मतदान के वक्त कंट्रोल यूनिट का सिर्फ क्लोज का बटन ही खुला रहता है, बाकी बटनों को सील लगाकर बंद किया जाता है। मतदान बंद होने के बाद पीठासीन अधिकारी क्लोज का बटन दबाकर मशीन को फिर से सील कर स्ट्रांग रूम पहुंचाते हैं।

ऐसे होती है वोटों की गिनती
गिनती के वक्त कंट्रोल यूनिटों की सील खोली जाती है। रिजल्ट का बटन दबाते ही उसमें पड़े कुल वोटों की संख्या डिस्पले पर आ जाती है।

इसके बार एक-एक कर प्रत्याशियों को पड़े वोटों को डिस्पले करता है। वोटों की गिनती होने के बाद भी क्लीयर का बटन नहीं दबाया जाता है, जिससे उसमें पड़े वोट सुरक्षित रहते हैं।

कहां से आती हैं अंगुली पर लगने वाली स्याही
अंगुली पर लगाए जाने वाली स्याही मैसूर से आती है। मैसूर के राजा ने 1937 में मैसूर पेंट्स एंड वार्निंस नाम से फैक्ट्री खोली।

आजादी के बाद भारत निर्वाचन आयोग ने इसी कंपनी से स्याही का अनुबंध किया, जो आज भी बरकरार है। कंपनी भारत के अलावा दूसरे देशों में भी स्याही एक्सपोर्ट करती है।

भारत को छोड़कर दुनिया के बाकी देशों में करीब 400 मिलीयन लोग मतदान करने के लिए इस स्याही का इस्तेमाल कर चुके हैं।
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