सुनामी पर आईटीईडब्ल्यूएस ने जो जानकारियां जुटाई वे 100 फीसदी खरी उतरी। इसकी और गहनता से मॉनीटरिंग की जा सके, इसके लिए ‘लैंड बेस्ड सीसमिक स्टेशन’ और ‘रडार बेस्ड कोस्टल मानीटरिंग स्टेशन’ लगाने होंगे।
भूकंप से होने वाली तबाही पर उन्होंने कहा कि इसका पूर्वानुमान मुश्किल है। ऐसे में इसके साथ रहना सीखना होगा। उन्होंने जोर दिया कि अस्पताल, पुलिस स्टेशन आदि भवनों को भूकंपरोधी बनाया जाए। देश में भूकंप को लेकर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। बहु मंजिलें भवन बनाने से पहले मिट्टी की सॉलिड लिक्विड फेक्शन की जांच जरूर कराई जानी चाहिए। स्कूली बच्चों को इससे बचाव के प्रति जागरूक करना होगा।
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक डॉ. कलाचंद सांई ने कहा कि विज्ञान का अधिकतम इस्तेमाल मानवता की रक्षा और इसके विकास के लिए होना चाहिए। सर जेसी बोस, डॉ. सीवी रमन, डॉ. मेघनाथ साहा जैसे वैज्ञानिकों का उल्लेख करते हुए निदेशक साईं ने कहा कि इन वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध की मदद से विश्व को नई दिशा मिली है। सेमिनार में संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. बीआर अरोरा, डॉ. मीना तिवारी, डॉ. वीसी ठाकुर आदि वैज्ञानिक व शोधार्थी उपस्थित रहे।
देश में अब अर्थक्वेक अर्ली वार्निंग सिस्टम के साथ ही पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे सेटेलाइट के जरिए भी भूकंप पर नजर रखी जाएगी। देश के वैज्ञानिक भूकंप के बाद वायुमंडल में फैले इलेक्ट्रान को टोटल इलेक्ट्रान कंट्रोल (टीईसी) से आकलन कर भूकंप की जानकारियां देेंगे।
यह बात जियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और देश के जानेमाने भूकंप विज्ञानी पद्मश्री डॉ. हर्ष कुमार गुप्ता ने दी। डॉ. गुप्ता के मुताबिक डिपार्टमेंट ऑफ अर्थसाइंस की पहल पर इस योजना पर काम किया जा रहा है। भूकंप की जानकारी हासिल की जा सके, इसके लिए उत्तराखंड समेत कई संवेदनशील राज्यों में सेंसरयुक्त उपकरण लगाए गए हैं।
डॉ. गुप्ता के मुताबिक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि चमोली में आए भूकंप का असर देहरादून में 25 सेकंड बाद देखने को मिला। ऐसे में यदि अर्ली वार्निंग सिस्टम के जरिए भूकंप की सटीक जानकारी मिलती है तो देहरादून के लोगों को आगाह किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए पूरा तंत्र विकसित करना होगा।