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सैनिक दुश्मनों से नहीं हारे, परिजन अपनों से हार गए

Mon, 26 Feb 2018 12:34 PM IST
अंकुर शर्मा/ अमर उजाला, हल्द्वानी
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सैनिक के परिवार अंदर से टूटने लगे
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देश की आन बान और शान पर मर मिटने वाले बहादुर सैनिक के परिवार अंदर से टूटने लगे हैं। जो सैनिक दुश्मनों से नहीं हारे, जिन्होंने दुश्मनों को मार कर परमवीर चक्र तक हासिल किया, उनके परिजन अपनों से ही हार गए।

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नेताओं के कोरे आश्वासन से वे निराश हैं। बरसों पहले किए वादे को पूरा नहीं करने का दुख उन्हें आज भी सालता है। वीर सैनिकों की पत्नियों और आश्रित राजनेताओं के वादों को सिर्फ जुमला करार देते हैं। कहते हैं कि बात तो गृह कर से मुक्त करने से लेकर हवाई जहाज में मुफ्त यात्रा तक की हुई थी मगर मिला कुछ नहीं।

न पेट्रोल पंप मिला न गैस एजेंसी 
रानीखेत के बगवाली पोखर निवासी चंदन सिंह ने 22 साल की उम्र में देश के लिए जान न्योछावर कर दी। उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र मिला था। उनकी बूढ़ी मां शांति देवी दो बेरोजगार भाइयों रमेश और कुंदन के साथ सुविधाओं के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही हैं। भाई कुंदन ने बताया कि मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि मदद करेंगे लेकिन सरकार पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी तो क्या देती, गांव के एक स्कूल का नाम तक शहीद भाई के नाम पर नहीं किया गया।
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गृहकर में है छूट, फिर भी होती है वसूली
कालाढूंगी के रहने वाले 82 वर्षीय शौर्य चक्र विजेता सूबेदार मेजर उर्वादत्त छेत्री ने बताया कि 1966 में मिजोरम में आतंकवादियों को मौत के घाट उतार कर शांति व्यवस्था कायम करने पर शौर्य चक्र से नवाजा गया। सरकार ने वादा किया था कि सैनिकों को गृह कर नहीं देना होगा। अब नगर पंचायत पहले कर वसूल लेती है फिर कर वापस कराने में इतने चक्कर काटने पड़ते हैं कि पसीने छूट जाते हैं। इसी तरह मुफ्त हवाई यात्रा का वादा किया गया जो आज भी सिर्फ घोषणा ही है।

आश्रितों के लिए नहीं है गुजर बसर के इंतजाम
हल्द्वानी के चौफुला चौराहा निवासी द्रौपदी देवी ने बताया कि उनके पति ठाकुर राम 13 जुलाई 1992 को सिक्किम में आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से नवाजा गया। बेटियां दीपा और अंजू के भविष्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया। दीपा ने बताया कि उनके संघर्ष की गाथा को अमर उजाला ने छापा था तब नींद टूटी और उन्हें सेना में नौकरी मिली। आज वह सेना में तैनात हैं, जबकि छोटी बहन जीएनएम करने के बाद भी बेरोजगार हैं। सरकार ने शहीदों के आश्रितों के लिए कोई इंतजाम नहीं किया।

चप्पलें घिसी तब भाई को मिली नौकरी 
अल्मोड़ा के हवालबाग मेहला पतली बगड़ के रहने वाले नवीन चंद्र जोशी 23 साल की उम्र में ही 1991 में ऑपरेशन रक्षक में शहीद हो गए थे। उन्हें सेना मेडल से नवाजा गया। बाद में सरकार ने एक सोलर लाइट देकर एक सैनिक की शहादत का मोल चुका दिया। बाद में चप्पलें घिसी तो भाई विपिन जोशी को सेना में नौकरी मिली। आज जब बूढ़े पिता विशन दत्त जोशी को सम्मान मिला तो उनकी आंखें भर आईं।

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