दिसंबर में फरमान जारी होता है कि जिनको भारत जाना है वे तत्काल पाकिस्तान छोड़ दें। फिर क्या था हमारा परिवार, चाचा-ताऊ सहित सभी संबंधी वहां से रातों-रात भारत के लिए निकल पड़े। कई किमी तो कड़ाके की ठंड में पैदल चलना पड़ा। सारे लोग रेल की तीन बोगियों में बैठकर जैसे-तैसे अमृतसर पहुंचे। वहां से राजस्थान के भरतपुर फिर फरीदाबाद गए। वहां पाकिस्तान से आने वाले लोगों को शिविर में ठहराया जा रहा था। उनके रहने-खाने की व्यवस्था भी की गई थी।
बुजुर्ग उर्मिला भावुक होकर बताती हैं कि पाकिस्तान में तो हम जमींदार थे। दुकानें, खेत-खलिहान थे, लेकिन सब छोड़कर भारत आए तो दो-तीन साल तक शरणार्थियों का जीवन जीना पड़ा, लेकिन शिविर में आखिर कब तक जिंदगी काटते। फिर पिताजी ने ठेली लगाकर रेवड़ी, मूंगफली बेचना शुरू किया। इसके बाद किसी के कहने पर मध्य प्रदेश के मुरैना चले गए वहां कपड़ों की फेरी लगाने लगे। तभी सरकार ने पाकिस्तान में जमीन, मकान छोड़कर आए लोगों को मुआवजे के साथ 250 गज जमीन देनी शुरू की, इससे जीवन फिर धीरे-धीरे पटरी पर आ गया।
कश्मीर के पहलगाम में हुई आतंकी घटना पर भावुक होकर वह कहती हैं कि यह नहीं होना चाहिए था। देश में सब कुछ तो ठीक हो रहा था। देश विकास के रास्ते पर तरक्की कर रहा है, लेकिन इस तरह की घटनाओं से तनाव बढ़ने के साथ ही विकास का पहिया थम जाता है। इससे सीमावर्ती इलाकों में रह रहे लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।