जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर पेरिस में आयोजित सम्मेलन में भारत की ही चली है। अहम बात यह है कि सम्मेलन में भारत विकासशील देशों के अगुवा के रूप में उभरा।
विकसित देशों के विरोध के बावजूद भारत ने विकासशील देशों के हितों से जुड़े कई बिंदुओं पर समझौते में मुहर लगवा ली। सबसे अहम बात यह है कि विकासशील देशों को 20 साल तक कोयला (जीवाश्म) ईंधन के इस्तेमाल की छूट मिल गई है।
जबकि, विकसित देशों को इसका प्रयोग रोकने के लिए कहा गया है। समझौते में ‘समान लेकिन भिन्न उत्तरदायित्व’ और ‘नियंत्रित कार्बन उत्सर्जन’ जैसे बिंदुओं को भारत के दबाव में ही शामिल किया गया। ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री से नीचे रखने का मुद्दा सबसे पहले भारत ने ही उठाया था, जिसे अब पूरी दुनिया ने मान लिया है।
पेरिस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य वन अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ जलवायु परिवर्तन विज्ञानी डॉ. वीआरएस रावत ने बताया कि भारत ने ‘समान लेकिन भिन्न उत्तरदायित्व’ और ‘नियंत्रित उत्सर्जन’ की मजबूती से पैरवी की। जबकि, विकसित देश इन दोनों ही बिंदुओं के खिलाफ थे। लेकिन आखिरकार पूरी दुनिया ने भारत के तर्कों को स्वीकार किया।
डॉ. रावत ने बताया कि महासम्मेलन में यह तर्क रखा गया कि विकासशील देश वर्ष 1885 से औद्योगिक क्रांति से कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं, जबकि विकासशील देशों में विकास का यह दौर अब शुरू हुआ है। इस पर अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस आदि देश राजी हुए कि विकासशील देश जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन साथ वैकल्पिक ऊर्जा का भी विकास करेंगे।
दो डिग्री तापमान का बिंदु भारत 10 वर्ष से उठा रहा है। इसे मैक्सिको में आयोजित सम्मेलन कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप-17) में भी उठाया गया था। साथ ही इसे जलवायु परिवर्तन से संबंधित अन्य वैश्विक मंचों पर भी रखा गया।