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पेरिस समझौते में भारत की चली लेकिन विकसित देशों पर कसी लगाम

Wed, 16 Dec 2015 05:49 PM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
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जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर पेरिस में आयोजित सम्मेलन में भारत की ही चली है। अहम बात यह है कि सम्मेलन में भारत विकासशील देशों के अगुवा के रूप में उभरा।
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विकसित देशों के विरोध के बावजूद भारत ने विकासशील देशों के हितों से जुड़े कई बिंदुओं पर समझौते में मुहर लगवा ली। सबसे अहम बात यह है कि विकासशील देशों को 20 साल तक कोयला (जीवाश्म) ईंधन के इस्तेमाल की छूट मिल गई है।

जबकि, विकसित देशों को इसका प्रयोग रोकने के लिए कहा गया है। समझौते में ‘समान लेकिन भिन्न उत्तरदायित्व’ और ‘नियंत्रित कार्बन उत्सर्जन’ जैसे बिंदुओं को भारत के दबाव में ही शामिल किया गया। ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री से नीचे रखने का मुद्दा सबसे पहले भारत ने ही उठाया था, जिसे अब पूरी दुनिया ने मान लिया है।
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पेरिस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य वन अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ जलवायु परिवर्तन विज्ञानी डॉ. वीआरएस रावत ने बताया कि भारत ने ‘समान लेकिन भिन्न उत्तरदायित्व’ और ‘नियंत्रित उत्सर्जन’ की मजबूती से पैरवी की। जबकि, विकसित देश इन दोनों ही बिंदुओं के खिलाफ थे। लेकिन आखिरकार पूरी दुनिया ने भारत के तर्कों को स्वीकार किया।

डॉ. रावत ने बताया कि महासम्मेलन में यह तर्क रखा गया कि विकासशील देश वर्ष 1885 से औद्योगिक क्रांति से कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं, जबकि विकासशील देशों में विकास का यह दौर अब शुरू हुआ है। इस पर अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस आदि देश राजी हुए कि विकासशील देश जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन साथ वैकल्पिक ऊर्जा का भी विकास करेंगे।

दो डिग्री तापमान का बिंदु भारत 10 वर्ष से उठा रहा है। इसे मैक्सिको में आयोजित सम्मेलन कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप-17) में भी उठाया गया था। साथ ही इसे जलवायु परिवर्तन से संबंधित अन्य वैश्विक मंचों पर भी रखा गया।
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भारत का स्टैंड रहा हावी

डॉ. रावत ने बताया कि एसोसिएशन आफ स्माल आइलैंड कंट्रीज ग्लोबल वार्मिंग 2 डिग्री से नीचे रखने के बिंदु का विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि इसे घटाकर 1.5 डिग्री सेल्सियस किया जाए, क्योंकि इससे ज्यादा तापमान बढ़ने पर कई द्वीप डूब जाएंगे।

इस मुद्दे पर आखिरकार भारत का स्टैंड हावी रहा। अगर तापमान की लिमिट नीची 1.5 डिग्री सेल्सियस रखी जाती तो विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन रोकने के लिए बहुत अधिक संसाधनों का इस्मेताल करना पड़ता।

ग्लोबल वार्मिंग की दर
वर्ष 1901 से 2001 (100 साल)- .6 डिग्री सेल्सियस
वर्ष 1905 से 2005 (100 साल)- .74 डिग्री सेल्सियस
वर्ष 1850 से 2010 (125 साल)- .85 डिग्री सेल्सियस

यह बिंदु भी मानें
- अधिक से अधिक संख्या में पेड़ लगाए जाएं, फोरेस्ट कवर एरिया बढ़ाया जाए
- इको सिस्टम सर्विसेज का नियंत्रित इस्तेमाल हो
- देश अपनी विशेषज्ञताओं का फायदा दूसरे देशों को दें
- वैकल्पिक ऊर्जा के बढ़ावे पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाए

विकसित देशों पर लगाम
विकसित देशों से कार्बन उत्सर्जन पर अतिशीघ्र प्रतिबंध लगाने के लिए कहा गया है, चूंकि कार्बन उत्सर्जन के लिए सबसे अधिक विकसित देश जिम्मेदार हैं, इसलिए वे विकासशील देशों को वैकल्पिक ऊर्जा विकास के लिए मदद देंगे।
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