प्रदेश के अशासकीय स्कूलों में टीचरों की नियुक्तियों में जमकर फर्जीवाड़ा हुआ है।
खबर है कि टीचर बनने के लिए 10 से 15 लाख और प्रिंसिपल के लिए 25 लाख रुपये तक की बोली लगी। नौकरी में पैसों की बोली से पात्र अभ्यर्थियों के साथ अन्याय हुआ और अपात्र अभ्यर्थी नौकरी पा गए।
शिक्षा विभाग में नौकरी के लिए कई लोग न सिर्फ फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर अभ्यर्थी नौकरी पा गए बल्कि पैसों का लेनदेन भी खूब चला।
गुपचुप तरीके से चहेतों की नियुक्ति
पैसा
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बताया गया है कि पैसा न देने वाले अभ्यर्थियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया। विभागीय सूत्रों के मुताबिक गदरपुर ऊधमसिंह नगर के एक स्कूल में टीचरों की भर्ती के लिए आवेदन मांगे जाने के बाद अभ्यर्थियों को न बुलाकर गुपचुप तरीके से चहेतों को नियुक्ति दे दी गई।
वहीं दूसरी ओर दून में कार्यरत शिक्षा विभाग के एक बाबू पर आरोप है कि उसने वर्ष 2008 से 2012 तक फर्जी मार्कशीट बनवाकर कई टीचरों की नौकरी लगाई है।
आरोप यह है यह व्यक्ति नौकरी के लिए 70 फीसदी धनराशि पहले और 30 फीसदी नौकरी लगने के बाद लेता रहा है। इसने अशासकीय स्कूलों में टीचरों को नौकरी दिलाई है, जो फर्जी अंक पत्र बनाने से लेकर नौकरी दिलाने तक का ठेका लेता रहा है। ऋषिकेश देहरादून निवासी एक व्यक्ति ने शिक्षा महानिदेशक विद्यालयी शिक्षा से इस पूरे मामले की लिखित शिकायत की है।
व्यवस्थापक की बेटी हेडमास्टर
कोर्ट
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दून के एक स्कूल में व्यवस्थापक की बेटी अशासकीय स्कूल की हेडमास्टर बनी है। खबर है कि वह पिछले एक साल से स्कूल छोड़ अमेरिका में है।
इसके बावजूद विभाग की ओर से हर माह उसका वेतन जारी हो रहा है। सूत्रों का कहना है कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों के संज्ञान में पूरा मामला है, इसके बावजूद वह मामले को दबाए हुए हैं।
लीपापोती में लगे अधिकारी
टीचरों की नियुक्तियों में फर्जीवाड़े पर अब तक दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाई है। कार्रवाई हो भी भला कैसे। विभागीय अधिकारी खुद मामलों की जांच कर पूरे प्रकरण की लीपापोती में लगे हैं।