सूबे में सत्तारूढ़ रही सरकारों की चिंता और तमाम दावों के बावजूद उत्तराखंड की आर्थिकी में कृषि क्षेत्र का योगदान लगातार कम हो रहा है।
आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले पांच साल में प्रदेश की अर्थव्यवस्था का आकार तो बढ़ा है, लेकिन इसमें खेती का योगदान लगातार कम हो रहा है। पिछले पांच सालों में कृषि उत्पादन में भी गिरावट दर्ज हुई है। तरक्की के आंकड़ों में लुढ़कती खेती की ये दास्तान पहाड़ से हो रहे पलायन को भी दर्शा रही है। खेती को लेकर चिंता में डालने वाले ये तथ्य प्रदेश सरकार के अर्थ एवं सांख्यिकी विभाग द्वारा जारी आंकड़ों से सामने आए हैं।
इन आंकड़ों के मुताबिक कृषि, उद्यान, पशुपालन, वानिकी और मछली पालन क्षेत्र के विकास को इंगित करने वाले प्राथमिक क्षेत्र का राज्य की आर्थिकी में योगदान लगातार कम हुआ है। वर्ष 2011-12 में प्राथमिक क्षेत्र का प्रदेश की अर्थव्यवस्था में 14 फीसदी तक योगदान था। मगर वर्ष 2013 की आपदा के बाद से ये सेक्टर लगातार पिछड़ रहा है। वर्ष 2016-17 में प्राथमिक क्षेत्र का प्रदेश की आर्थिकी में योगदान 11.19 फीसदी रहा, जबकि प्रदेश की अर्थव्यवस्था का आकार वर्ष 2015-16 तक एक लाख 74 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
प्रदेश की अर्थव्यवस्था में सेक्टर वाइज योगदान
सेक्टर-2011-12-2016-17
प्राथमिक-14.00-11.19
द्वितीय-52.13-50.40
तृतीय-33.88-38.41
फसलों के उत्पादन में गिरावट (मी.टन)
फसलें-2013-14-2015-16
अनाज-1729183-1641100
चावल-593068-585921
गेहूं-848134-772383
दालें-61029-51534
गन्ना-6061428-5885755
आधे-अधूरे प्रयास
पहाड़ में खेती और उद्यानिकी के विकास के लिए पिछली सरकार में राजस्व विभाग ने एक शासनादेश किया। इस शासनादेश का ध्येय पर्वतीय क्षेत्रों में उजाड़ हो रही खेत-खलिहानों को बचाना था। इसके तहत पहाड़ से पलायन कर चुके लोगों को कानूनी सुविधा प्रदान की गई कि वे अपने खेतों को 30 साल तक लीज पर दे सकते हैं। मगर प्रचार के अभाव में इसका खास फायदा नहीं हो सका।
पर्वतीय क्षेत्र में कम होती खेती चिंता का विषय है। ये मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल है। कॉन्ट्रैक्ट खेती की योजना तैयार की जा रही है, जिसका पहाड़ की खेती को फायदा होगा। पूर्व में जारी शासनादेश का प्रचार के कारण फायदा नहीं उठाया जा सका।
- सुबोध उनियाल, कृषि मंत्री